Category Archives: Fiction

Movie Review: Shuddh Desi Romance: A Crackling Storyline

Shuddh Desi Romance

By Ankush Kumar

Cast: Sushant Singh Rajput, Parineeti Chopra, Vaani Kapoor, Rishi Kapoor.

Introduction: ‘Kamine hai re’ This desi romance is no way shuddh but is a crackling film all the way.

Plot: Raghu (Sushant) is a guide, about to get married when he develops cold feet. Enter Gayatri (Parineeti) and they fall in love. Fall out of it, fall in it again. Vaani is the damsel in distress who loses out eventually. Set in Jaipur this movie catches the essence of youth and their confused minds.

Tech Spec: The pink city has turned blue for this one, yet is captured very well. The minutest detailing by Jaideep Sahni is very intriguing in the screenplay. The music has a feel good factor to it and enhances the plot in totality.

Acting: Vaani makes an impressive debut and essays her role with ease, Sushant Singh portrays the role of a rustic guide with elan, but its Parineeti that steals the show. She is vivacious and will leave the audience spellbound with her performance. Rishi Kapoor: Do we say more?

Citizen Kane moments: Many of them but the stand out ones are a jalebi vendor scratching his back with a spoon, or the scene where Sushant cheats neighbors two be the cousin of Parineeti or the scene when they fall in love.

Kela moments: The final clash between Vani & Parineeti is a huge let down.

Brownie points 4 out of 5.

Yashraj stable has reversed the trend. Watch it for the new order that has been established.

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Zanjeer Review: Not Cult But Not Bad Either

zanjeer

By Ankush Kumar

Cast: Priyanka Chopra, Sanjay Dutt, Ram Charan & Prakash Raj.

Introduction: The original Zanjeer was not a cult classic yet was a good movie. Its remake is no different.

Premise: An angry cop and his angst against the system. A revenge saga that is brutal yet very fresh and convincing.

Plot: Same as the Bachchan original.

Acting: Ram Charan makes an impressive debut, he was never going to be compared with the legend, but still if comparisons are drawn he has performed no less. Priyanka is in to do very little. Mahie Gill & Prakash Raj have done a splendid job. Watch the two when they spoof Bindu & Ajit from the original. It is hilarious.

Tech Spec: The script is very well crafted, retaining the essence of the original and meshing it with modern day drama can get very confusing, but the writers have got this one spot on. The action of the movie is very well choreographed. Apoorva Lakhia holds the film together very nicely. He has smartly created an intelligent masala potboiler.

Kela Moments: None to be honest.

Citizen Kane moment: The scene of Mahie Gill & Prakash Raj spoofing Ajit & Bindu, the opening scene where Ram Charan bashes up a goon on the streets with Chiranjeevi’s poster in the background. The one-liners which are used judiciously and generate laughter.

Brownie Points: 3.5/5.

Ram Charan stands out as the men amongst the boys!!!!

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 3

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– अनघ शर्मा

अपने बचपन में किसी भूगोल की किताब में पढ़ा था कि दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट इंडोनेशिया में हुआ था। इतना बड़ा की उसमें से निकले धुएं के कारण अगले पूरे वर्ष धरती के एक बहुत बड़े हिस्से का तापमान सामान्य से कई गुना नीचे दर्ज़ किया गया था। मैं जब तक उसके पास रहा ये जान ही नहीं पाया की कितना कुछ धधकता है उसके भीतर। अब सोचता हूँ कि अगर उसके भीतर का ज्वालामुखी फट गया होता तो कितने वर्षों के लिए हिम-युग आता। पर न ज्वालामुखी फटा, न ऐसा कुछ हुआ। आख़िरी बार भी बहन ही ने खबर दी थी उसके बारे में।
बड़ी बदल गयी है वो, अजब बुढ़ापा झांकता है उसके चेहरे से अब।
बूढी तो अपनी माँ भी लगने लगी हैं, याद है कितनी खूबसूरत थीं हमारे बचपन में , मैंने कहा।
ब्यूटी इज़ द कर्स। वो बोलीं।
फ़ोन रखने के बाद मैं देर तक उसी की याद में डूबा रहा, पर सिवाय एक धुंधले के कुछ नहीं दीखा। वैसे भी जब से बंगलौर शिफ्ट हुआ हूँ ,घर जाना ही नहीं हो पाया। पिछले दस सालों में तो एक बार भी नहीं जा पाया हूँ। रात की शांत फ़िज़ा बार-बार खुद में यही दोहरा रही थी कि हर इमारत को एक रोज़ खंडर में बदलना ही होता है।
” जानते नहीं ख़ूबसूरती की ज़िल्द पर सबसे पहले जंग लगती है। फिर टुकड़ा-टुकड़ा, पर्त-पर्त ये ज़िल्द खुद ही गल जाती है ……… वर्तमान की जो भी इमारत अपने अतीत में जितनी ज्यादा खूबसूरत रही होगी भविष्य में उसके खंडर बन्ने की आशंका उतनी ही प्रबल होगी। वैसे भी खूबसूरत चेहरों को बदलने में वक़्त ही कहा लगता है? बस एक वक्फ़ा …….

कहाँ तक पहुंचे छोटे लल्ला ?
अजब है तू भी, चित्त- पट्ट का मामला थोड़े है। सिक्का उछालूं, थामूं, देखूं और फ़ैसला हो गया।
तुम तो बहुत बखत बरत रहे हो।
तो क्या किस्सा-कोताही कर दूं ?
तुम से अच्छा तो छोटी जिजी कह-लिख देतीं।
तो फिर उसी के पास जा। हट! परे।
वो उदासी में डूबा हंसता चेहरा ले कर चली गयी। पर जाते-जाते एक भेद पकड़ा गयी कि सबसे पहले हंसते चेहरों की हंसी उतर कर देखनी चाहिए। आजकल उदासी बड़ी चालक हो गयी है। अगर खुश रहना है तो छुपी उदासी को निकाल फेंकना होगा। हाँ पता है उदासी और डर बड़े पक्के होते हैं ,एक बार पकड़ लें तो फिर छोड़ते नहीं। शांत बहते पानी में ज्यों अचानक पहाड़ियां निकल आयें, ऐसे मन पर कब्ज़ा कर लेते हैं ये। कई बार तो यह भय जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं। फिर भी जीवन जीना ही है आखिर तक। जीवन की चाह को लगातार ईधन देना पड़ता है, हर हाल में। जीवन की राहें आसन नहीं होतीं, किसी के लिए भी नहीं।
उसके जीवन की राह भी बड़ी कठिन थी,उसके नियंत्रण से परे। वो अगढ़-अनपढ़ भले ही थी पर बड़ी समझदार थी। वो जानती थी कि राह अगर टेढ़ी-मेढ़ी, पथरीली हो तो भी एक बार को कट ही जाएगी। पर वह सपाट राह जो काई से चिकनी हुई, शैवालों से पटी पड़ी हो, उसका क्या ?और अगर ऐसी फिसलन भरी डगर पर मूंह बके बल गिरना निश्चित हो तो क्या नंगे पांव खड़े हो संतुलन बनाये रखने की चेष्टा करना या चप्पल पहन तुरंत ही गिर पड़ना।

थोड़ी देर यूँ ही बेतरतीब ख्यालों में उलझे रहने के बाद मैंने बहुत दिन घर से बाहर रहने के कारण फ़ोन में जमा हुए वॉइस-मेसेज सुनना शुरू कर दिए। उनमें से एक बड़ी बहन का भी था तो कुछ वक़्त बाद उन्हें ही फ़ोन मिला दिया।
कैसी हो ?
ठीक हूँ। तू कैसा है ?
मैं भी ठीक हूँ।
तेरी आवाज़ थकी हुई सी कैसी लग रही है ?
बस ज़रा-बहुत थकावट है।
बड़ी रात गए फ़ोन किया तूने? सब खैरियत ?
हाँ, आज ही लौटा हूँ हैदराबाद से, तुम्हारा वॉइस-मेसेज था फ़ोन में तो सोचा तुम से ही बात कर लूं।
और क्या चल रहा है ?
कुछ नहीं, अच्छा तुमसे एक बात पूछनी थी।
क्या?
मुझे आजकल धीमरी बहुत दीखती है सपनों में। तुम जानती हो उसके नीम-पागल होने की क्या वजह थी।

सोशल-इंजस्टिस,सामाजिक अन्याय और हम सब में छुपा हुआ सबसे बड़ा भय। तब ज़माना आज के जैसे नहीं था कि एक कैंडल-मार्च निकालो लोग साथ जुड़ जायेंगे, भले ही धीरे-धीरे ही सही। दबंगों की दबंगई से तो आज भी मिडिल-क्लास और छोटा तबका डरता है, तब की तो बात ही छोडो। छोटे शहरों में तथाकथित बदलाव की गुंजाईश ही कहाँ होती थी तब ?
छोटे शहर चुस्त-ट्राउज़र्स की तरह होते हैं। धड से नीचे घुटनों तक इतने चुस्त की हवा भी इकहल्लर नहीं निकल सकती। घुटनों से नीचे जिस हिस्से को थोड़ी आज़ादी होती है वो हिस्सा मध्य-वर्ग का है ,जो चार पैसे जोड़ मौका लगते ही अपने बच्चों को बड़े शहरों की तरफ निकल देते हैं ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह पाए,पर सबसे ज्यादा मार खाता है हमारे यहाँ का निचला तबका। ढंकने को उसके पास कुछ होता नहीं नंगा वो चाह कर भी नहीं हो सकता। बंद पड़े-पड़े ख्यालों में बेड-सोर पैदा हो जाते हैं, कुंठाएं पनप जाती हैं, ज़हन कुंद पड़ जाते हैं।
लूट-डकैती दबंग डालते हैं और पुलिस पकड़ के ले जाती है गरीब घरों के बच्चों को। जिन्हें ये सिस्टम धीरे-धीरे पेशेवर मुजरिम में ढाल देता है। कुछ सालों में ये बच्चे हाव-भाव, चाल-ढाल,शक्ल-सूरत, रंग-रूप में एक जैसे हो जाते हैं। हाँ ये सच है अब समय बदला है और समाज के बड़े प्रोटेगोनिस्ट इन्हीं तबकों से निकलते हैं।
अरे !छोड़ो ये बातें , उसकी बताओ।

ऐन होली से एक रात पहले दबंगों के लड़के खींच कर ले गए थे इसको। रात भर बिना कपड़ों के नचाया इसे। कपड़ों के बदले सौदा तय हुआ मीना का। बाद में खाली पेटीकोट थमा के भेज दिया इसे।
और कोई बोल नहीं मुहल्ले भर से?
सब सोते रहते हैं ऐसे मौकों पर।
और मीना ?
मीना कब लौटी, किस हाल में लौटी ? किसी ने नहीं देखा। जब अम्मा ही महीनों बाद जान पाई तो कोई और क्या जानता?
मुझे क्यों नहीं बताया? मैं लगभग रुआंसा सा बोल।
तुम बंगलौर थे उस वक़्त कॉलेज में। हमें खुद ही बहुत देर से पता चला तो तुम्हें क्या बताते।बाद में सालों बीतने पर लगा की अब बताने का क्या औचित्य ? बाद में अम्मा ही राजघाट जा कर उसका सब सामान बहा आईं थीं। पर कुछ और भेद भी छुपा था उनके मन में जिसे कोई और नहीं जान पाया कभी भी, लोग अक्सर सच छुपा ही जाते हैं। एक बात पता है तुझे, लाल, नीली, पीली, चमकीली, काली, दुनिया में मौजूद और भी जितनी स्याहियां हैं उन सब का इस्तेमाल करके किस्से-कहानियां लिखने वाले जानते हैं कि वो पूरा सच नहीं लिख रहे हैं। चाहे कल्पना का ही नाम क्यों न दें उसे पर अधूरी ही है हर बात। भले ही कागज़ पर लिखी जाये, या रेशम पर, या फिर पत्थर पर ही उकेरी जाये , हर कहानी सच पर एक कलई चढ़ाये रखती है। चाहे मैं लिखूं या कोई और पर पूरा या पूरे जैसा कोई कभी कुछ लिख ही नहीं पाता। सच हमेशा कहानियों में नए-नए कपड़े पहने टुकड़े-टुकड़े में ही आ पाता है। पूरा सच तो अनगढ़, उलझा, लश्तम-पश्तम ताले लगे मन में कहीं पड़ा हुआ सांस लेता रहता है। मजाल है किसी की जो अपने ही मन का ताला खोल सच टटोल सके।

फ़ोन काटने के बाद मैं सन्न, अवाक बैठा रह गया। क्या था ये जो मुझे अभी पता चला ? कोई डरावना सच, या किसी फिक्शन का हिस्सा जो पढ़ा नहीं बस सुना भर हो। किस दर्ज़ा ट्रॉमा होगा। कैसी भयानक सौदेबाज़ी होगी वो? जिस्म के बदले जिस्म उफ़ !। मैं पक्षघात के मरीज सा थम के रह गया। कोई चिकोटी काटे तो भी महसूस न हो।

देखा छोटे लल्ला मैं कहती थी न छोटी जिजी तुम से अच्छा लिख लेती हैं। कैसी सुघराई से सब बता गईं तुम्हें। घबरा के इधर-उधर देखा मैंने, कमरे में कोई नहीं था। डर के मारे कहानी के अध्-लिखे पन्ने फाड़ कर फ्लश-आउट कर दिए मैंने। शांत रात में सिर्फ़ हवाएं बह रहीं थीं , मैंने गौर से कान लगा कर सुना। वो हवाएं एक दर्द-भरा गीत गा रहीं थीं।
“मोरी पतुरियाँ माई गंगे बहा देव
मैं तो चली परदेस मोरे लाल”

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 2

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– अनघ शर्मा

मुझे हमेशा यूँ ही लगता था की उसका मन बेतवा के ढाल सा होगा।हमेशा साफ़, भरा और छलछलाता हुआ। चाहे कितना ही सूखा क्यों न आ जाये, पर मन के स्नेह का स्रोत हमेशा लबालब भरा हुआ रहेगा। पर लबालब भरे स्रोत से भी कई बार प्यासा ही लौटना पड़ता है।
उन दिनों दो बड़े बदलाव हो रहे थे मुझमें पहला तो होठों के ऊपर मूछों की लकीर उभर रही थी, और दूसरा मन भीतर एक कहानीकार बेचैन सा करवटें ले रहा था। सो एक दिन उसी धुन में मैं उससे कह बैठा। मैं एक दिन तुम्हारी भी कहानी लिखूंगा धीमरी।
क्या तय हुआ था ? पूर नाम, असली नाम छोटे लल्ला।
अच्छा ठीक है, नैनतारा। अब खुश ?
कहानी लिखना क्या इतना आसान होता है छोटे लल्ला ? बीस-पचीस बरस इंतज़ार करो, जब हमें भूल जाओ, हमारे कने दिमाग पे ज़ोर डालना पड़े तब लिखना।
चलो ये भी तय रहा, सो अब न शक्ल याद न आवाज़।
जाने-अनजाने जिंदगी की तरफ कभी कोई शर्त उछालो तो वो उसे एक ही बार में कैच कर लेती है, लपक लेती है, और फिर हर बीतते समय के साथ उसकी आवाज़ मंद पड़ जाती है पर एक आवाज़ कभी मंद नहीं पड़ी।
यूँ भी ज़िंदगी जो मसौदे तैयार करती है, ख़ाका खींचती है। आदमी की आरज़ू उसे दो कौड़ी का मान सिरे से नकार देती है, धड़े से ख़ारिज कर देती है। और जो चार सतरें चोरी-छुपे आरज़ू किसी लिफ़ाफे में भेजती है, उसे ज़िंदगी बड़ी होशियारी से गायब कर देती है, या पूरा मौजूं ही बदल देती है। आखिर में जीत ज़िंदगी की ही होती है।
उसकी ज़िंदगी के मसौदे उसकी आरज़ू से जीत गए।
………………………

ऐ धीमरी हमारे लड़के का कान बह रहा है कई दिन से ?
जिजी बबूल के फूल सरसों के तेल में पका कर ठंडा तेल दिन में तीन बार डालो, एक दिन में कान बहना बंद।
अच्छा धीमरी और मेरे लड़के का कान दुःख रहा है रात से।
लो बहन ,किसी जच्चा का दूध डाल दो थोडा सा दर्द ये गया वो गया।
धत ! पगली
ऐसे तमाम नुस्खे उसकी अंटी में बंधे रहते थे। बड़ी धीमी-धीमी आवाज़ में एक गीत गया करती थी।
” भौंरा भनर-भनर होय मेरी गुइंयाँ / गजरा लहर-लहर होय मेरी गुइंयाँ
जब मोरे राजा पिया आयें अटरिया / जियरा धुकुर-पुकुर होय मेरी गुइंयाँ “

ऐं छोटे लल्ला, क्या सारी कहानी हम पर ही लिखोगे ? अपनी भी कुछ कहो।
अपनी क्या कहें कुल जमा आठ सतरें लिखे तो हो गयी पूरी कहानी।
ऐसे न बनेगी बात।
अच्छा सुनो। भरा-पूरा परिवार था, बाद में बाप जाते रहे। दिन बदले, थोड़े बिगड़े-थोड़े बने और रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी चल निकली।
ये तो कोई बात न हुई। कहानी में ख़ास बातें होती हैं। कुछ ख़ास हो तो बोलो छोटे लल्ला।
ख़ास क्या ? हाँ ज़ब्त बहुत था हमें,होता भी क्यों न ? माँ-बाप को ख़ासा ज़ब्त था। खूब गालियाँ सुनी दोनों ने घर वालों की। पिता ने तो मरने के बाद भी खूब सुनी। पैसे से कमज़ोर आदमी को सबसे ज्यादा मार अपने घर के अन्दर ही सहनी पड़ती है। ये न समझना की हमें प्यार न मिला। बहुत मिला,टूट-टूट मिला पर कम लोगों से। बाकी लोगों से दिली नहीं काम चलाऊ सा मिला। सो यूँ कुछ वाकयों से कुछ लोग दिल से उतर गए। उतरे तो फिर कभी न चढ़े।
अच्छा छोडो हमारी। अपनी पर आओ, ये कहानी तुम्हारी है। बातें मत उलझाओ।
अच्छा ये बताओ तुम वहां से भाग क्यों आयीं ?
बताते हैं सबर रखो। पहले वादा करो हमारी कहानी में एक किस्सा है ,उसका ज़िक्र न करोगे।
पागल हो क्या ? उसका ज़िक्र कैसे न होगा ? सब उसी पर तो टिका है इस कहानी का। वैसे भी आदमी की फ़ितरत होती है, इधर-उधर से जोड़-जाड़ अपनी समझ लायक कुछ ठीक-ठाक सा किस्सा बना ही लेता है।
तुम्हें मालूम ही नहीं , छोटी जिजी जानती हैं सब।
मैं पूछ लूँगा उनसे। समझी।
वो चुप बैठी मेरा चेहरा ताकती रही।
खट से मेरी नींद खुल गयी। सपना ही तो था ये, आँख खुली और हवा हो गया।
……………………………

वो वहाँ से क्यों भाग आई थी ? ये हममें से कोई नहीं जनता था। पर उसे माँ से कई बार ये कहते सुना था।
” जानती हो जिजी कोई औरत दो बातों बिना अपने ठिये से नहीं भागती। अपने पेट और पीठ, या तो पेट की औलाद पर आंच होगी या अपनी पीठ भारी होगी। “
अब सोचता हूँ पीठ तो कभी भारी रही नहीं होगी उसकी। उसके भागने में जरूर पहले वाली बात ही होगी।
माँ से उसकी दोस्ती का किस्सा भी अजीब था। सालों पहले एक दो-तीन बरस की बच्ची के साथ वो हमारी मौसी को आगरा बस-अड्डे पर मिली थी। सो वहां से पहले उनके घर और बाद में हमारे घर आ गई सदा के लिए, और हमारे जीवन में रच-बस गई जैसे गर्मियों की धूप और सर्दियों का कोहरा।
बाद में समय की दौड़ से क़दम मिलाने के लिए हम भी बाहर चले गए। महीनों घर नहीं आते थे, जो कभी आते भी तो अपने-अपने में मश्गूल रहते थे।
एक बार कॉलेज की छुट्टियों में जब घर गया तो उसकी बेटी को न पा कर बड़ा आश्चर्य हुआ मुझे।
मीना कहाँ है? मैंने पूछा।
चली गयी।
कहाँ ?
अपने सासरे और कहाँ ?
ऐं ! पागल है क्या ? ब्याह होता तो हमें पता न चलता क्या ?
हमारे सासरे गयी थी, वहीं हो गया।
कुल तेरह-चौदह की तो थी। इतनी छोटी का ?
हमारे यहाँ इतने का ही होता है।
और हाँ !तेरा ही कौन सासरा बचा है दुनिया में ?
उसने एक कातर दृष्टि से माँ को देखा और अन्दर चली गयी।
क्या हुआ इसे ?
कुछ नहीं, बीमार थी कई दिनों से।
क्या बीमारी थी ?
औरतों की बात है, तुम्हें क्या बताएं। माँ ने कहा तो मैं चुप हो गया. यह भी भली बात थी की औरतों की बात में मेरा क्या काम ? फिर यूँ भी एक छोटे से वाक्य में निहितार्थ क्या ढूंढना ?
पर सालों बाद वो खुद ही अधूरी बात का सूत्र थम गयी।
……………………

ऐं, छोटे लल्ला रंगीन अखबार है ?
अखबार, क्या करेगी ?
कुछ रखना है।
क्या ?
पेटीकोट।
नहीं है, मैं झूठ बोल गया। हांलाकि मेरे पलंग के गद्दे के नीचे खूब रंगीन अखबार रखे रहते थे। फिल्मों का बहुत शौक़ था मुझे, और अखबार में इतवार के इतवार एक रंगीन फ़िल्मी पन्ना आता था।
झूठ क्यों बोलते हो? गद्दे के नीचे रखे तो रहते हो। एक-दो दे दो।
ले मर ! मैंने झटके से हाथ पटका। आह !हाथ झंझनाता हुआ पलंग के पाये से जा टकराया। ये भी सपना था, टूट गया। सपने बहुत आते थे मुझे कहानियों में या सपनों में कहानियां। सपने और कहानियां मुझे आते थे और उन्हें लिखने का शऊर बड़ी बहन को।

बड़ी दी उन दिनों मानवीय रिश्तों के तमाम आकलन करती कहानियां लिख रही थीं। पर उसका आकलन करना बड़ा मुश्किल और पेचीदा काम था , ठीक वैसे ही जैसे बकरियों की सवारी पर कोई रेगिस्तान पार करना।

“कोटेड और अनकोटेड बातों के बीच की लकीर, सड़क के तारकोल में फंसे छोटे-छोटे पत्थरों की लिपि और किनारे तक जा कर डूबने वाले आसमान को पढने वाले एक रोज़ बड़े अकेले रह जाते हैं। “
या फिर ये
” पीछे उतर के देखो, तारीख़ में गहरे बहुत गहरे जा कर देखो दस, बीस, सौ, दो-सौ, चार-सौ बरस पीछे जा कर देखो कि एक शाहकार के पैदा होने के लिए और कितनों को पैदा होना पड़ता है। यकीं न आये तो पूछो मुमताज से की एक ताजमहल के पैदा होने के लिए किस-किस को पैदा होना पड़ा था। एक शाहजहाँ को, एक दारा को, एक औरंगज़ेब को, एक शुजा को …… और भी न जाने कौन-कौन ??”
पर उसमें ऐसी कोई खूबी नहीं थी। न वो मुमताज थी न किसी शाहकार को पैदा कर सकती थी। न वो कथ्य-अकथ्य के बीच की पंक्ति ही पढ़ पाई थी। न जीवन भर चलने वाली सड़कों में फंसे पत्थरों की लिपि। न ही डूबते आसमानों के किनारे। फिर भी अंततः बहुत अकेली रह गई थी वो। बहुत पहले ये भी मुझे बहन ने ही बताया था कि वो धीरे-धीरे अपना मानसिक संतुलन खोती जा रही है।

 

 

 

 

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 1

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– अनघ शर्मा

” जब मोरे राजा पिया गये हैं बगीचा
भौंरा भनर-भनर होये मेरी गुइंयाँ ”
लक-दक करके दामन से झाड़ो तो अनगिनत यादें झड जाती हैं। पर ये भी तो सच ही है कि इतनी आसानी से कभी कोई याद भी नहीं आता। दिली तौर पर याद करना और ज़हनी तौर पर याद करना दोनों अलग-अलग हैं, फिर भी कुछ यादें ज़हन और दिल के बीच कहीं अटकी रहती हैं। उसकी याद भी कुछ ऐसी ही थी, कहीं ज़हन और दिल के बीच सुस्त पड़ी। पर एक कोशिश तो करनी ही थी इसे निकालने की। सो ये तय हुआ कि यादों के तोशखाने में से एक रजाई निकाली जाये। फिर रात भर कोई याद ओढ़ो। पुरानी याद की धुंधली गंध रिसते-रिसते दिल के तहख़ाने में बैठ जायेगी। यूँ एक कहानी के जन्म की बात होगी …… शर्त ये कि पैदाइश तक रजाई तोशखाने में वापस न रखी जाए।

उसकी तो पूरी कहानी ही शर्तों पे टिकी हुई थी।
पहली शर्त ये की …
“उसे उसके असली नाम से बुलाया जाये न कि लोक-प्रचलित धीमरी से ”
दूसरी ये की …….
“वो कहाँ से है ये कोई न जान पाए ”
दूसरी शर्त तो जायज़ है। पर पहली,भला ये भी कोई बात हुई,असली नाम से पुकारें। उसके माँ-बाप या हमारी माँ को छोड़ इक्का-दुक्का ही कोई होगा जो उसका असली नाम जनता होगा। सभी तो उसे धीमरी कह कर बुलाते थे, अब इस नाम में क्या बुराई है भला ?
बुराई है,यह बड़ा व्यक्ति -वाचक है।एक बार लो तो तमाम दुनिया जान जाये। सो असली नाम छद्म पहचान का काम करेगा। न लिखने वाले के मन पे ही कोई बोझ और न उसके ही मन पर।
कई बार बड़ी बहन से कहा तुम ही लिख मारो उसकी कहानी। किस्से-कहानियों में तुम्हारा हाथ सधा हुआ है। पूरा न्याय कर पाओगी उस के साथ, जैसे अनुभवी शल्य चिकित्सक के हाथों त्वचा को सिलने में टांका इंच भर भी इधर-उधर नहीं होता, ठीक वैसे ही।
सो हर बार की तरह वही एक जवाब। अरे ! उस पर कहानी लिखना कोई डबल रोटी का टुकड़ा खाने जैसा है क्या ? कि जैम नहीं तो न सही मार्मलेड लगा कर खा लेंगे। ये तो याद है, ठीक नमक की तरह, अगर स्वाद लेना हो तो खुद ही चखना पड़ता है। बाकी मौका-बेमौका, वक़्त-बेवक्त तुम्हें ठोंक-पीट कर दुरुस्त करते रहेंगे। फिर तुम्हारी यारी-दोस्ती भी थी उसके साथ सो तुम्ही लिखो।
अजी क्या ख़ाक दोस्ती थी ? असल नाम तक तो याद नहीं हमें उसका। करो, अब करो दुरुस्त ??
अच्छा याद कर जब वो कोई काम बिगाड़ देती थी तो क्या कहती थीं अम्मा ?
“एक काम भी ठीक से नहीं होता तुझसे, वही हाल है तेरा आँख के अंधे नाम नयनसुख। आँखें है या बुझते दिये, देख के भी नहीं चलती। ”
ये अलग बात है कि नज़र उसकी पाक-साफ़ 6/6 थी।
तो पहली शर्त के लिहाज़ से उसका नाम नैनतारा था।
उसकी जो सबसे स्पष्ट याद है,वही बड़ी धुंधली है। चेहरा-मोहरा, कद-काठी तो अब याद नहीं ढंग से, मगर कुछ याद है तो उसके कॉलर-बोन के गड्ढे। वो इतने बड़े और इतने गहरे थे कि मुझे हमेशा लगता था जैसे दो सूखे हुए तालाब हों, और कभी इनमें बेतवा का साफ़-ठंडा पानी भरा रहता होगा। बेतवा इस लिए की दूसरी शर्त के लिहाज़ से वो ऐसे इलाके से भाग कर आई थी,जो कहीं बेतवा किनारे था।

Retribution – A Short Story

murder mystery

 

By Ganesh Subramanian

It was a bright morning in New York. Ritesh woke up to the sound of chirping birds beside his window. He rubbed his eyes for his vision to clear. He looked at the Christiano Ronaldo poster that adorned one of the walls of the living room. The poster showed Ronaldo ready to take a free kick. Ritesh was reminded of the premier league match that he planned to watch that night that featured Christiano Ronaldo. Almost as if stirred by memory, his eyes moved to the calendar which was hanging from one of the walls. The date 11th of December was circled in bright red colour. Ritesh smiled at the irony that the date was circled in red and not in any other colour. Today was the 11th of December. The circled date reminded him of the most important task that he wanted to accomplish that day, an accomplishment that would banish the demons of humiliation, embarrassment and pain, an accomplishment that would exorcise the ghosts of the past once and forever. This was something important that he has to finish at any cost. The premier league match can wait.

After a quick shower, he reached his office. After checking his mails and mailing his daily updates to his boss, Ritesh was waiting for a call which he was expecting that day of all days.  The next minute, his mobile screen flashed the name of Vimmy Veronika. Ritesh answered the call.

“Happy Birthday, my cutie teddy”, said the female voice at the other end.

“Thanks. Surprising to see that you have come to office on time”, mocked Ritesh.

“Only for you, dear”, answered Veronika. “Ok Listen. Come over for dinner tonight at my place”, said Veronika.

This was what Ritesh wanted to hear. But still he played with Veronika. “I have lots of work. Need to prepare that presentation for the board meeting this Friday”, said Ritesh.

“Oh, Come on. If you spend a couple of hours over dinner at my place, your board won’t sack you”, Veronika said.

“Alright. I will be there at 9.” replied Ritesh.

“Now that’s my boy. See ya” said Veronika.

Ritesh winded up the day’s work by 8 pm and when his SUV landed in Veronika’s Eastbrook apartments, it was 8.45 pm.

Ritesh and Veronika were from India, but now working in the US. Veronika was born to a Hindu father and a Christian mother, hence the name has a combination of Hindu and Christian names (Vimmy, short for Vimala, a Hindu name and Veronika for her Christian roots). Having got to know each other through a common friend, Ritesh and Veronika loved each other as if there is no tomorrow. Veronika told Ritesh that she will make her dad announce him as her life partner during her birthday party. Ritesh bought an apartment with his year-long savings to present it to Veronika. On the birthday party, Vimmy’s dad announced her engagement to Deepak John, an Indo-American businessman. Ritesh was heartbroken. The worst part was Veronika seemed to be happy with her dad’s decision. She told Ritesh that Deepak was well-settled and she could not disappoint her father. This sudden change in Veronika baffled him. Through some of his sources, Ritesh came to know that Deepak and Veronika had been pals in college and they had a very intense relationship and before they knew it, Veronika was pregnant. So this marriage is a quick heal solution before things could go out of hand. Ritesh’s blood boiled on hearing this. “How could she do this to me?”, he wondered. Although they both had kept in touch occasionally through the phone after this incident, things were never the same again between them.

Veronika welcomed Ritesh. After a sumptuous dinner, they settled on the couch and were having a few drinks. Veronika got up to bring another bottle. Ritesh got up and followed her. When Veronika pulled out the bottle from the fridge and turned back, Ritesh was standing close to her. He flashed a romantic smile. He moved close to her and put an arm on her waist. He brought his face close to hers. Past memories came flooding back to Veronika. She couldn’t resist. Anticipating a kiss from Ritesh, she closed her eyes. This was the opportune moment he was waiting for. He brought out a kitchen knife, its steel finish glistening in the dimly lit CFL lamp. In a swift motion, he plunged the knife into Veronika’s midsection. Veronika froze in horror and pain. The bottle dropped from her hands. Before she could scream, Ritesh’s left hand closed her mouth. He pulled out the knife and drove it harder into her abdomen again. Ritesh came close and whispered into Veronika’s ear – “You shouldn’t have done this to me, you lecherous bitch!”. Saying so, he pushed Veronika. She dropped dead on the floor.

One more task to be accomplished. Ritesh started his SUV and headed towards Maxington Lane. He reached Silver Oak apartments in Maxington lane and headed to Door # 145 in the 3rd floor. Jeevitha, a Tamilian from the southern part of TamilNadu, the occupant of #145, opened the door.

“Yes. How may I help you?” said Jeevitha.

“I am Ritesh. I am the brother of Mukesh, your reportee. I want to talk to you” replied Ritesh.

“Come in.” said Jeevitha.

“I know why you are here. To say that your brother is innocent. But the records seem to tell a different story. The 10 lakhs that disappeared was his responsibility. There were no expenses of that magnitude that day. Only way the money could have disappeared is when Mukesh himself had taken it. Better he admit his crime, so that atleast his punishment would come down” replied Jeevitha.

“Mukesh is not like that. He is innocent. He is being fabricated in this case for some moron’s crime. Do not go by what you hear. Listen to your heart. Save him from this mess”, pleaded Ritesh.

“I am sorry. I can’t do anything. Your brother has to face the consequences”, Jeevitha said firmly.

“Will you help him or not?”, Ritesh said in a menacing tone.

“No. If you don’t leave now, I’ll call the cops”. Saying so, Jeevitha moved towards the telephone.

Ritesh was fast. He pulled Jeevitha back and twisted her right arm behind her back.

” I am asking you one last time. Your statement against my brother tomorrow will finish his career. After that, Mukesh will not be alive. Think again.” said Ritesh.

Jeevitha didn’t listen to him. She extricated herself from Ritesh’s grasp and ran to the window to shout and alert the apartment’s security. Ritesh was equally quick. In one motion, he twisted Jeevitha’s left arm behind her back and put his right arm around her neck. Then he brought out the kitchen knife and slit her throat in a smooth motion. Jeevitha’s crumpled form fell to the floor.

Satisfied with his accomplishments, Ritesh left house no. 145 with the occupant lying in a pool of blood.

 

 

Madras Cafe Review: Dark, Deep And Exemplary Storytelling

madras cafe

By Ankush Kumar

Cast: John Abraham, Nargis Fakhri, and Raashi Khanna.

Introduction: Coffee apart, this one filters bullshit as well and presents an engaging political thriller; get off the train baby and head right into ‘Madras Cafe’.

Premise: This is a story about a hero who fails to save the Prime minister. It’s built around the incidents leading upto the assassination of the Prime minister.

Plot: ‘Madras Cafe’ is a dark, deep and exemplary film about the politics of separatism. If you have a penchant for history and know a little about the LTTE struggle, the connect will be instant. For the naive, it still is an engaging entertainer. Even though no names are taken its quite obvious that the story is about Prabhakaran, LTTE and the killing of Rajiv Gandhi.

Technical Insight: The cinematography by Kamaljeet Negi captures the right tones throughout, the music is unconventional but has a double play value, the editing and sound designs is the stand out aspect of the film. But what puts a cherry on the top is the direction of Shoojit Sircar.

Acting: John Abraham plays a RAW agent, and for a change looks and behaves like one. Nargis Fakhri essays the role of a war correspondent and does it brilliantly. Raashi Khanna is promising but the stand out one is is Prakash Belawade as John associate who takes home the honors.

Kela moment: Jaya speaking in English and Vikram answering in Hindi.

Citizen Kane moment: The climax of the movie.

Brownie points: 4 out of 5.