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Traffic Woes And Kochi

traffic delays

By Malathy Madathilezham

What are the uses of roads?

1. It is an obstacle course intended to test the skills?

2. It is a rain water drain?

3. Garbage disposal unit?

4. Who cares!!!!

Well the the people in charge of the maintenance/construction of road in Kochi would definitely select the fourth option I guess!! I say ‘people’ because even that is a question that I don’t have a proper answer to!!! Public Works Department? National Highways Authority of India?The Corporation??

Lot of confusion…so I am not getting into that.

I, like many other Kochiites, need to travel to reach my office every morning and come back in the evening. Now what is supposed to be a very simple 5 to 8 km distance to be covered has been made more interesting with a well designed obstacle course, with puddles or stones to be avoided, streams of water and other miscellaneous stuff to make the ride more interesting! You know in case we get bored! Whichever route you take, the road provide you ample entertainment, thrills and a very slow tour of the city for those of you tourists!

Kochi is growing. Yes, it definitely is! But good roads are substantially important for any city, growing or not! After all transport of men and material is important for any commercial activity. Accidents are just one of the hazards. Imagine after paying hefty road taxes, the long term impacts on our body by travelling on these disgracefully bumpy paths, that are supposed to be called ‘roads’! I think we should sue the authorities for the irreparable physical damage to our bodies!!!

Everyday morning, I get up, the thought of going to office scares me. It puts me off because of these dreadful paths… All I want is the right (luxury?) of being able to ride/drive to office in reasonably good roads, without having to dodge the puddles or holes, water streams etc… Is that too much to ask????

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लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 2

love pictures

 

– अनघ शर्मा

मुझे हमेशा यूँ ही लगता था की उसका मन बेतवा के ढाल सा होगा।हमेशा साफ़, भरा और छलछलाता हुआ। चाहे कितना ही सूखा क्यों न आ जाये, पर मन के स्नेह का स्रोत हमेशा लबालब भरा हुआ रहेगा। पर लबालब भरे स्रोत से भी कई बार प्यासा ही लौटना पड़ता है।
उन दिनों दो बड़े बदलाव हो रहे थे मुझमें पहला तो होठों के ऊपर मूछों की लकीर उभर रही थी, और दूसरा मन भीतर एक कहानीकार बेचैन सा करवटें ले रहा था। सो एक दिन उसी धुन में मैं उससे कह बैठा। मैं एक दिन तुम्हारी भी कहानी लिखूंगा धीमरी।
क्या तय हुआ था ? पूर नाम, असली नाम छोटे लल्ला।
अच्छा ठीक है, नैनतारा। अब खुश ?
कहानी लिखना क्या इतना आसान होता है छोटे लल्ला ? बीस-पचीस बरस इंतज़ार करो, जब हमें भूल जाओ, हमारे कने दिमाग पे ज़ोर डालना पड़े तब लिखना।
चलो ये भी तय रहा, सो अब न शक्ल याद न आवाज़।
जाने-अनजाने जिंदगी की तरफ कभी कोई शर्त उछालो तो वो उसे एक ही बार में कैच कर लेती है, लपक लेती है, और फिर हर बीतते समय के साथ उसकी आवाज़ मंद पड़ जाती है पर एक आवाज़ कभी मंद नहीं पड़ी।
यूँ भी ज़िंदगी जो मसौदे तैयार करती है, ख़ाका खींचती है। आदमी की आरज़ू उसे दो कौड़ी का मान सिरे से नकार देती है, धड़े से ख़ारिज कर देती है। और जो चार सतरें चोरी-छुपे आरज़ू किसी लिफ़ाफे में भेजती है, उसे ज़िंदगी बड़ी होशियारी से गायब कर देती है, या पूरा मौजूं ही बदल देती है। आखिर में जीत ज़िंदगी की ही होती है।
उसकी ज़िंदगी के मसौदे उसकी आरज़ू से जीत गए।
………………………

ऐ धीमरी हमारे लड़के का कान बह रहा है कई दिन से ?
जिजी बबूल के फूल सरसों के तेल में पका कर ठंडा तेल दिन में तीन बार डालो, एक दिन में कान बहना बंद।
अच्छा धीमरी और मेरे लड़के का कान दुःख रहा है रात से।
लो बहन ,किसी जच्चा का दूध डाल दो थोडा सा दर्द ये गया वो गया।
धत ! पगली
ऐसे तमाम नुस्खे उसकी अंटी में बंधे रहते थे। बड़ी धीमी-धीमी आवाज़ में एक गीत गया करती थी।
” भौंरा भनर-भनर होय मेरी गुइंयाँ / गजरा लहर-लहर होय मेरी गुइंयाँ
जब मोरे राजा पिया आयें अटरिया / जियरा धुकुर-पुकुर होय मेरी गुइंयाँ “

ऐं छोटे लल्ला, क्या सारी कहानी हम पर ही लिखोगे ? अपनी भी कुछ कहो।
अपनी क्या कहें कुल जमा आठ सतरें लिखे तो हो गयी पूरी कहानी।
ऐसे न बनेगी बात।
अच्छा सुनो। भरा-पूरा परिवार था, बाद में बाप जाते रहे। दिन बदले, थोड़े बिगड़े-थोड़े बने और रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी चल निकली।
ये तो कोई बात न हुई। कहानी में ख़ास बातें होती हैं। कुछ ख़ास हो तो बोलो छोटे लल्ला।
ख़ास क्या ? हाँ ज़ब्त बहुत था हमें,होता भी क्यों न ? माँ-बाप को ख़ासा ज़ब्त था। खूब गालियाँ सुनी दोनों ने घर वालों की। पिता ने तो मरने के बाद भी खूब सुनी। पैसे से कमज़ोर आदमी को सबसे ज्यादा मार अपने घर के अन्दर ही सहनी पड़ती है। ये न समझना की हमें प्यार न मिला। बहुत मिला,टूट-टूट मिला पर कम लोगों से। बाकी लोगों से दिली नहीं काम चलाऊ सा मिला। सो यूँ कुछ वाकयों से कुछ लोग दिल से उतर गए। उतरे तो फिर कभी न चढ़े।
अच्छा छोडो हमारी। अपनी पर आओ, ये कहानी तुम्हारी है। बातें मत उलझाओ।
अच्छा ये बताओ तुम वहां से भाग क्यों आयीं ?
बताते हैं सबर रखो। पहले वादा करो हमारी कहानी में एक किस्सा है ,उसका ज़िक्र न करोगे।
पागल हो क्या ? उसका ज़िक्र कैसे न होगा ? सब उसी पर तो टिका है इस कहानी का। वैसे भी आदमी की फ़ितरत होती है, इधर-उधर से जोड़-जाड़ अपनी समझ लायक कुछ ठीक-ठाक सा किस्सा बना ही लेता है।
तुम्हें मालूम ही नहीं , छोटी जिजी जानती हैं सब।
मैं पूछ लूँगा उनसे। समझी।
वो चुप बैठी मेरा चेहरा ताकती रही।
खट से मेरी नींद खुल गयी। सपना ही तो था ये, आँख खुली और हवा हो गया।
……………………………

वो वहाँ से क्यों भाग आई थी ? ये हममें से कोई नहीं जनता था। पर उसे माँ से कई बार ये कहते सुना था।
” जानती हो जिजी कोई औरत दो बातों बिना अपने ठिये से नहीं भागती। अपने पेट और पीठ, या तो पेट की औलाद पर आंच होगी या अपनी पीठ भारी होगी। “
अब सोचता हूँ पीठ तो कभी भारी रही नहीं होगी उसकी। उसके भागने में जरूर पहले वाली बात ही होगी।
माँ से उसकी दोस्ती का किस्सा भी अजीब था। सालों पहले एक दो-तीन बरस की बच्ची के साथ वो हमारी मौसी को आगरा बस-अड्डे पर मिली थी। सो वहां से पहले उनके घर और बाद में हमारे घर आ गई सदा के लिए, और हमारे जीवन में रच-बस गई जैसे गर्मियों की धूप और सर्दियों का कोहरा।
बाद में समय की दौड़ से क़दम मिलाने के लिए हम भी बाहर चले गए। महीनों घर नहीं आते थे, जो कभी आते भी तो अपने-अपने में मश्गूल रहते थे।
एक बार कॉलेज की छुट्टियों में जब घर गया तो उसकी बेटी को न पा कर बड़ा आश्चर्य हुआ मुझे।
मीना कहाँ है? मैंने पूछा।
चली गयी।
कहाँ ?
अपने सासरे और कहाँ ?
ऐं ! पागल है क्या ? ब्याह होता तो हमें पता न चलता क्या ?
हमारे सासरे गयी थी, वहीं हो गया।
कुल तेरह-चौदह की तो थी। इतनी छोटी का ?
हमारे यहाँ इतने का ही होता है।
और हाँ !तेरा ही कौन सासरा बचा है दुनिया में ?
उसने एक कातर दृष्टि से माँ को देखा और अन्दर चली गयी।
क्या हुआ इसे ?
कुछ नहीं, बीमार थी कई दिनों से।
क्या बीमारी थी ?
औरतों की बात है, तुम्हें क्या बताएं। माँ ने कहा तो मैं चुप हो गया. यह भी भली बात थी की औरतों की बात में मेरा क्या काम ? फिर यूँ भी एक छोटे से वाक्य में निहितार्थ क्या ढूंढना ?
पर सालों बाद वो खुद ही अधूरी बात का सूत्र थम गयी।
……………………

ऐं, छोटे लल्ला रंगीन अखबार है ?
अखबार, क्या करेगी ?
कुछ रखना है।
क्या ?
पेटीकोट।
नहीं है, मैं झूठ बोल गया। हांलाकि मेरे पलंग के गद्दे के नीचे खूब रंगीन अखबार रखे रहते थे। फिल्मों का बहुत शौक़ था मुझे, और अखबार में इतवार के इतवार एक रंगीन फ़िल्मी पन्ना आता था।
झूठ क्यों बोलते हो? गद्दे के नीचे रखे तो रहते हो। एक-दो दे दो।
ले मर ! मैंने झटके से हाथ पटका। आह !हाथ झंझनाता हुआ पलंग के पाये से जा टकराया। ये भी सपना था, टूट गया। सपने बहुत आते थे मुझे कहानियों में या सपनों में कहानियां। सपने और कहानियां मुझे आते थे और उन्हें लिखने का शऊर बड़ी बहन को।

बड़ी दी उन दिनों मानवीय रिश्तों के तमाम आकलन करती कहानियां लिख रही थीं। पर उसका आकलन करना बड़ा मुश्किल और पेचीदा काम था , ठीक वैसे ही जैसे बकरियों की सवारी पर कोई रेगिस्तान पार करना।

“कोटेड और अनकोटेड बातों के बीच की लकीर, सड़क के तारकोल में फंसे छोटे-छोटे पत्थरों की लिपि और किनारे तक जा कर डूबने वाले आसमान को पढने वाले एक रोज़ बड़े अकेले रह जाते हैं। “
या फिर ये
” पीछे उतर के देखो, तारीख़ में गहरे बहुत गहरे जा कर देखो दस, बीस, सौ, दो-सौ, चार-सौ बरस पीछे जा कर देखो कि एक शाहकार के पैदा होने के लिए और कितनों को पैदा होना पड़ता है। यकीं न आये तो पूछो मुमताज से की एक ताजमहल के पैदा होने के लिए किस-किस को पैदा होना पड़ा था। एक शाहजहाँ को, एक दारा को, एक औरंगज़ेब को, एक शुजा को …… और भी न जाने कौन-कौन ??”
पर उसमें ऐसी कोई खूबी नहीं थी। न वो मुमताज थी न किसी शाहकार को पैदा कर सकती थी। न वो कथ्य-अकथ्य के बीच की पंक्ति ही पढ़ पाई थी। न जीवन भर चलने वाली सड़कों में फंसे पत्थरों की लिपि। न ही डूबते आसमानों के किनारे। फिर भी अंततः बहुत अकेली रह गई थी वो। बहुत पहले ये भी मुझे बहन ने ही बताया था कि वो धीरे-धीरे अपना मानसिक संतुलन खोती जा रही है।

 

 

 

 

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 1

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– अनघ शर्मा

” जब मोरे राजा पिया गये हैं बगीचा
भौंरा भनर-भनर होये मेरी गुइंयाँ ”
लक-दक करके दामन से झाड़ो तो अनगिनत यादें झड जाती हैं। पर ये भी तो सच ही है कि इतनी आसानी से कभी कोई याद भी नहीं आता। दिली तौर पर याद करना और ज़हनी तौर पर याद करना दोनों अलग-अलग हैं, फिर भी कुछ यादें ज़हन और दिल के बीच कहीं अटकी रहती हैं। उसकी याद भी कुछ ऐसी ही थी, कहीं ज़हन और दिल के बीच सुस्त पड़ी। पर एक कोशिश तो करनी ही थी इसे निकालने की। सो ये तय हुआ कि यादों के तोशखाने में से एक रजाई निकाली जाये। फिर रात भर कोई याद ओढ़ो। पुरानी याद की धुंधली गंध रिसते-रिसते दिल के तहख़ाने में बैठ जायेगी। यूँ एक कहानी के जन्म की बात होगी …… शर्त ये कि पैदाइश तक रजाई तोशखाने में वापस न रखी जाए।

उसकी तो पूरी कहानी ही शर्तों पे टिकी हुई थी।
पहली शर्त ये की …
“उसे उसके असली नाम से बुलाया जाये न कि लोक-प्रचलित धीमरी से ”
दूसरी ये की …….
“वो कहाँ से है ये कोई न जान पाए ”
दूसरी शर्त तो जायज़ है। पर पहली,भला ये भी कोई बात हुई,असली नाम से पुकारें। उसके माँ-बाप या हमारी माँ को छोड़ इक्का-दुक्का ही कोई होगा जो उसका असली नाम जनता होगा। सभी तो उसे धीमरी कह कर बुलाते थे, अब इस नाम में क्या बुराई है भला ?
बुराई है,यह बड़ा व्यक्ति -वाचक है।एक बार लो तो तमाम दुनिया जान जाये। सो असली नाम छद्म पहचान का काम करेगा। न लिखने वाले के मन पे ही कोई बोझ और न उसके ही मन पर।
कई बार बड़ी बहन से कहा तुम ही लिख मारो उसकी कहानी। किस्से-कहानियों में तुम्हारा हाथ सधा हुआ है। पूरा न्याय कर पाओगी उस के साथ, जैसे अनुभवी शल्य चिकित्सक के हाथों त्वचा को सिलने में टांका इंच भर भी इधर-उधर नहीं होता, ठीक वैसे ही।
सो हर बार की तरह वही एक जवाब। अरे ! उस पर कहानी लिखना कोई डबल रोटी का टुकड़ा खाने जैसा है क्या ? कि जैम नहीं तो न सही मार्मलेड लगा कर खा लेंगे। ये तो याद है, ठीक नमक की तरह, अगर स्वाद लेना हो तो खुद ही चखना पड़ता है। बाकी मौका-बेमौका, वक़्त-बेवक्त तुम्हें ठोंक-पीट कर दुरुस्त करते रहेंगे। फिर तुम्हारी यारी-दोस्ती भी थी उसके साथ सो तुम्ही लिखो।
अजी क्या ख़ाक दोस्ती थी ? असल नाम तक तो याद नहीं हमें उसका। करो, अब करो दुरुस्त ??
अच्छा याद कर जब वो कोई काम बिगाड़ देती थी तो क्या कहती थीं अम्मा ?
“एक काम भी ठीक से नहीं होता तुझसे, वही हाल है तेरा आँख के अंधे नाम नयनसुख। आँखें है या बुझते दिये, देख के भी नहीं चलती। ”
ये अलग बात है कि नज़र उसकी पाक-साफ़ 6/6 थी।
तो पहली शर्त के लिहाज़ से उसका नाम नैनतारा था।
उसकी जो सबसे स्पष्ट याद है,वही बड़ी धुंधली है। चेहरा-मोहरा, कद-काठी तो अब याद नहीं ढंग से, मगर कुछ याद है तो उसके कॉलर-बोन के गड्ढे। वो इतने बड़े और इतने गहरे थे कि मुझे हमेशा लगता था जैसे दो सूखे हुए तालाब हों, और कभी इनमें बेतवा का साफ़-ठंडा पानी भरा रहता होगा। बेतवा इस लिए की दूसरी शर्त के लिहाज़ से वो ऐसे इलाके से भाग कर आई थी,जो कहीं बेतवा किनारे था।

Safety Of Women And Self Defense

BE-SAFE

By Malathy Madathilezham 

We are all living in this illusion of safety. That a woman can be attacked and assaulted in the ladies compartment of a train is totally appalling. It shows us the lack of security and safety in our cities. Delhi, even though it is the capital of India, is somewhere I would not want to live in and neither would my parents encourage. Just the  incidents that actually get reported would discourage any woman to go live on her own in the city. But this is closer to home!On 28th January 2011, there was this report in the newspaper claiming that Kochi is safe for women. I sarcastically had retorted that this is because women here do not step out after 7 pm!

If anything this recent tragedy that cut short the life of Soumya only points to the glaring issues that need to be addressed regarding the safety and security of women. The fact that this happened in the Ladies compartment of a train, is ironic and makes us question the kind of security provided.  This struck me as my parents always asked me to avoid sitting in the ladies compartment unless there are a good number of co – passengers. According to them the ladies compartment in the most dangerous one!

Lot of hue and cry is being raised over this incident now. Citizens are agitated and indignant. The politicians are making statements and counter statements.A lot of promises are being made. The media is also giving a lot of hype. But what will change actually remains to be seen. Once this story becomes ‘stale’, will the issue of the freedom of a woman to travel, to even get out of the house at any time of the day remain an important issue? Will the women in Kerala stand up and raise their voice against any kind of exploitation or harassment  faced by them almost on a daily basis? Or will they accuse each other of being the instigating these attacks? I now remember the public signature campaign that our college students’ council against the harassment faced by women while travelling in buses and otherwise. It had generated a mass response from both the local media and the public and a lot of changes were definitely brought about. But even those were short lived and not consistent.

Who is to blame for these kind of attacks on the dignity and safety of women?

The lax attitude of the government?

The society in which such perverted characters are molded?

Ourselves?

How can such attacks be prevented? How can we make our cities safer for women? Multiple responsibilities fall on multiple people.

Let us first talk about ourselves before anyone else.

So how do we ensure our safety, security and keep our dignity? The easiest and most obvious is not to travel alone after a certain time.  But that would only encourage these hoodlums to attack the women who have no other choice but to travel by night. And what if you are attacked when at home or somewhere else?

I have written down some thoughts, which came to my mind

  • Learn some self-defense techniques! It will also boost your confidence.
  • Be alert and aware of people and your surroundings (this is applicable whether it is day or night)
  • Stay with the crowd. Especially at night do not move around deserted areas.
  • Avoid speaking on the mobile phone or do anything which can make u seem distracted.
  • Use a barrier or distance to make an attack difficult. Thus lock your doors!
  • Always carry something, which is easily and quickly accessible to use as a weapon. An umbrella (especially the kalan kuda)! A Pen, a safety pin and don’t hesitate to use it if required!
  • Do not hesitate to scream, shout in case you are being targeted whether overtly or covertly i.e attract attention.
  • If attacked, act quickly and decisively. How to escape or how to fight and incapacitate the attacker needs to be decided keeping in mind the surroundings and the situation.
  • Use your strongest weapons against the weakest targets of the attacker. The eyes, throat,  and groin are the primary targets while the abdomen and face are the secondary targets. Your strong weapons are the bottom of your feet, elbows, hammer fists and palm heels.
  • Stand up for any other woman being harassed or attacked. You also could be in a similar situation!
  • Please do approach the authorities. Do not hesitate to file a complaint. The perverted offenders should not be allowed to move around scot-free.
  • Share your experiences and tips on how to prevent such attacks with other women. Educate them.

These are not in any way an exhaustive list on how to prevent attacks and how to defend/protect yourself. But I hope it has given you some information and insight. If we act meek and submissive the chances of being targeted will only increase and at the same time reckless and reactive action is also not advised. Common sense, confidence and alertness are key to preventing attacks/ harassment and defending yourself.

What the government and railway authorities will or won’t do, we cannot be sure of. But that should not stop us from protecting our loved ones or ourselves.

सड़ा हुवा अनाज, सड़ी ही प्रणाली है!

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By Satish Tehlan

मेरा चिराग-ए-घर गया लील।
तुम्हारा घटिया मिड डे  मील ।।

घटिया मिड डे मील, वो भूखे ही अच्छे थे ।
नहीं सालता घाव, हमारे भी बच्चे थे ।।

सड़ा हुवा अनाज, सड़ी ही प्रणाली है।
मासूमों के हाथों में, चम्मच थाली है।।

चाहते हो क्या, थमा हाथ में उनके कटोरा ।
उनको भिक्षु बना रहा, जिनका मन है कोरा।।

A Birthday Bash Gone Awry

By Kartik Kannan

persuasion

8 am April 13- 2011

As I was browsing through the newspaper, I took a closer look at the date. I was 48 hours from my wife’s birthday, and it totally skipped my mind, since I was busy pursuing my alternate career as  a cricket correspondent for a radio station (Chennai LIVE 104.8 FM) in Chennai. Before my wife found out, that I had no surprises lined up on her birthday, I had to figure a place, mode of commute and a nice room (apart from a gift that makes her go WOW).

I went to my bathroom with my laptop, and within a few Google searches, honed in on Gokarna, a place diametrically opposite to Chennai, on the west coast. I booked bus tickets on KSRTC, for a 1330 bus ( or so I thought ), and booked a beach facing room on OM beach.

I told my wife, that there was a surprise waiting for her, and she should pack her bags for a quick 5 day trip. I did not mention the name of the place though, and used the time she was dressing up to buy her a watch.

45 minutes early or 15 minutes late?

We biked our way to the CMBT bus stand, reached there 45 minutes early, so that I could blindfold her in the bus, and not tell her the location. It turned out that, I had seen the 1330 bus, but had booked the 1230 bus instead, and here I was at the bus stand,15 minutes after the bus had left. One part of the surprise broke when she realized that we had to board another Bangalore bus. We took the 1330 bus, and found our way to Bangalore.

Bangalore Darshan

I realized that we had to reach Navrang Theatre ( North Bangalore) to board another private bus to Gokarna at 2130. Our bus to Bangalore was late (2010) and it reached Silk Board, on the southern periphery of the city, and I decided to get down here, and rush in auto to the northern end of the city. After agreeing to the auto-drivers random number quote, and frantic calls to my wife’s cousin in Bangalore, we realized that we may not make it to the 2130 bus, being stuck in one of the many traffic jams. My relatives sensed that we had not had any food, so packed some rotis for us, and drove to the bus stand, to ask the bus to wait for us. Luckily for us, the bus was delayed by 30 minutes and waited 5 more minutes for us, after our 3 wheel mad goose chase across the ends of the city. The conductor called out loud and clear, for passengers to Gokarna, and the final surprise element evaporated in thin air, as my wife heard his shrieks.

Celebritydom in Bhatkal

Some more adventure followed next morning. It was my turn to report on last night’s IPL match for the radio station back home, which I had completely forgotten. I had no clue about the game in last night’s mad chase, and had very little battery charge left on my mobile. I called up a friend, and he mailed me the Cricinfo scorecards, which I read in 2 minutes, and then the call came from the radio station asking me to stay on line, while they introduce me in the show. I could not do this in a moving bus with wind blowing from both sides, so asked the driver to stop on the road for 2 minutes, which was in the outskirts of a town called Bhatkal. I got down from the bus and got on with my match report, on phone with a lot of gesticulations with my hands and face, to drive home the impact of Pune beating Kochi in last night’s match. As I finished, I saw some 20 people around me, listening and watching intently, including the bus driver. They thought I was some celebrity who was doing Live reporting, since I also had my SLR camera dangling across my neck (which I had kept to take moving shots from the bus).

Meanwhile, my wife was clearly amused by the turn of events, and had quite a start to her birthday eve! We had more adrenalin than we had bargained for, and hoped we’d get some more on our trip, as the bus made its way to the rickety Gokarna Bus stand.