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A Look Inside Myanmar’s First Real Year Of Democracy – 3

Jack continues his photo exploration of Myanmar’s first real year of democracy. Presenting the third part of the 4-part series.

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Sunset from Ubein Bridge. Locals and tourists flock to the bridge to witness the spectacular sunsets.

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A young girl plays with her skipping rope outside the tourist jetty in Mandalay. Tourism in Myanmar has boomed over the past year, topping over one million foreign visitors for the first time. However infrastructure still remains underdeveloped.

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A passenger smokes a cheroot out of the train window.

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A trishaw driver, fishing in a flooded field hopes to catch something, while a cow wanders past.

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A young boy drags a bag of recyclable rubbish, which will be sold for small change. Often people of all ages work to support themselves and their families.

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A toddler sits by himself on the banks of the Irrawaddy river.

A Look Inside Myanmar’s First Real Year Of Democracy – 3

Movie Review: Satyagraha: Poor Story Except In Bits

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By Ankush Kumar

Cast: Amitabh Bachchan, Ajay Devgn, Kareena Kapoor, & Manoj Bajpayee.

Introduction: The message is loud and clear. And Satyagraha adds no new aspect to the revolution.

Premise: Only if you are news blind, you will miss the fact that this one is based on the Arvind Kejriwal & Anna Hazare movement.

Plot: Dwarka Anand (Amitabh Bachchan) is a school teacher who lives by the Gandhian principles, Maanav Raghvendra (Ajay Devgn) is a NRI business magnet. At the core it’s the story of these two individuals. How a shrewd businessman becomes a nationalist and then becomes part of the revolution.

Acting: Amitabh Bachchan is brilliant as he underplays his character, the portions where he really breaks down with citizen kanesque acts he is let down by his editors, Ajay Devgn disappoints this time though, the punch is missing in his dialogue delivery. Kareena Kapoor looks less of a journalist and more like an add on. The whistles might be heard but Manoj Bajpayee character is becoming caricaturish now. Arjun Rampal has a miniscule role but his heart is worn on his sleeves.

Technical Insight: The script disappoints, Anjum Rajabali can learn a thing or two with changing times, you will feel like re reading the newspapers all over again with very little entertainment value, editing is hopelessly bad, scenes of highest emotions has been killed by lazy edits. Cinematography though is brilliant especially the revolution bit. The music is a sore bore except for Raghupati Raghav Raja Ram. Prakash Jha, maybe out of commercial compulsions gives in, sir atleast once give us a Damul again.

Kela moments: Many actually. The songs weren’t needed. And how on earth Kareena Kapoor is the only journalist covering the agitation?

Citizen Kane moments: Amitabh Bachchan consoling his widowed daughter in law Amrita Rao, the scene where Mr. Bachchan breaks down when he returns to the scene of his son’s death and Mr. Bachchan scene where he tells Devgn he will miss him when he is gone.

Brownie Points: 2.5/5.

A Look Inside Myanmar’s First Real Year Of Democracy – 1

Jack Hoyle comes back with his second pictorial blog. From cricket, he makes a move to politics and democracy in Myanmar. Here’s his work behind the lens as Myanmar completes a year of democracy.

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Monks await the arrival of The Lady, Aung San Suu Kyi. A reported 100,000 people flocked to hear her give a speech. It was the first time she had visited Mandalay since her release from house arrest.

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Aung San Suu Kyi was over six hours late, due to the huge numbers of people in the streets cheering along her motorcade. Monks huddle together to keep warm, while another spectator shields himself from the rain with a poster of The Lady.

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A monk sewing.

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Workers load a boat in Mandalay, shored on the banks of the Irrawaddy River.

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A boy holds up a captured bird. This particular bird is often sold as street food along the roadside.

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Myanmar youths have found a new sense of confidence since the democratic reforms. Previously people, particularly the young, would have been persecuted for wearing such ‘daring’ attire, where as these days it’s a common sight.

kahen ya na kahen

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By Sharat D.Mathur

jee main aata hai har ik sham koi nazm kahen,

haat ho jate hain bezar, kahen ya na kahen

jee me aata hai ki vahashat ka vo lamha keh dain,

lavz ho jate hain khamosh, kahen ya na kahen

ashk kahtain hain ki gir jayen abhi kagaz par,

aankh jhuk jati hai chupchap, kahen ya na kahen

vo ye kahate hain ki shayar ho tum tumhi keh do

sunane wale hain wohi log, kahen ya na kahen

kuch main kahata hoon to kehtain hain ki kehta hai bohot

kuch na kehane pe bhi ilzam, kahen ya na kahen.

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 3

love pictures

– अनघ शर्मा

अपने बचपन में किसी भूगोल की किताब में पढ़ा था कि दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट इंडोनेशिया में हुआ था। इतना बड़ा की उसमें से निकले धुएं के कारण अगले पूरे वर्ष धरती के एक बहुत बड़े हिस्से का तापमान सामान्य से कई गुना नीचे दर्ज़ किया गया था। मैं जब तक उसके पास रहा ये जान ही नहीं पाया की कितना कुछ धधकता है उसके भीतर। अब सोचता हूँ कि अगर उसके भीतर का ज्वालामुखी फट गया होता तो कितने वर्षों के लिए हिम-युग आता। पर न ज्वालामुखी फटा, न ऐसा कुछ हुआ। आख़िरी बार भी बहन ही ने खबर दी थी उसके बारे में।
बड़ी बदल गयी है वो, अजब बुढ़ापा झांकता है उसके चेहरे से अब।
बूढी तो अपनी माँ भी लगने लगी हैं, याद है कितनी खूबसूरत थीं हमारे बचपन में , मैंने कहा।
ब्यूटी इज़ द कर्स। वो बोलीं।
फ़ोन रखने के बाद मैं देर तक उसी की याद में डूबा रहा, पर सिवाय एक धुंधले के कुछ नहीं दीखा। वैसे भी जब से बंगलौर शिफ्ट हुआ हूँ ,घर जाना ही नहीं हो पाया। पिछले दस सालों में तो एक बार भी नहीं जा पाया हूँ। रात की शांत फ़िज़ा बार-बार खुद में यही दोहरा रही थी कि हर इमारत को एक रोज़ खंडर में बदलना ही होता है।
” जानते नहीं ख़ूबसूरती की ज़िल्द पर सबसे पहले जंग लगती है। फिर टुकड़ा-टुकड़ा, पर्त-पर्त ये ज़िल्द खुद ही गल जाती है ……… वर्तमान की जो भी इमारत अपने अतीत में जितनी ज्यादा खूबसूरत रही होगी भविष्य में उसके खंडर बन्ने की आशंका उतनी ही प्रबल होगी। वैसे भी खूबसूरत चेहरों को बदलने में वक़्त ही कहा लगता है? बस एक वक्फ़ा …….

कहाँ तक पहुंचे छोटे लल्ला ?
अजब है तू भी, चित्त- पट्ट का मामला थोड़े है। सिक्का उछालूं, थामूं, देखूं और फ़ैसला हो गया।
तुम तो बहुत बखत बरत रहे हो।
तो क्या किस्सा-कोताही कर दूं ?
तुम से अच्छा तो छोटी जिजी कह-लिख देतीं।
तो फिर उसी के पास जा। हट! परे।
वो उदासी में डूबा हंसता चेहरा ले कर चली गयी। पर जाते-जाते एक भेद पकड़ा गयी कि सबसे पहले हंसते चेहरों की हंसी उतर कर देखनी चाहिए। आजकल उदासी बड़ी चालक हो गयी है। अगर खुश रहना है तो छुपी उदासी को निकाल फेंकना होगा। हाँ पता है उदासी और डर बड़े पक्के होते हैं ,एक बार पकड़ लें तो फिर छोड़ते नहीं। शांत बहते पानी में ज्यों अचानक पहाड़ियां निकल आयें, ऐसे मन पर कब्ज़ा कर लेते हैं ये। कई बार तो यह भय जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं। फिर भी जीवन जीना ही है आखिर तक। जीवन की चाह को लगातार ईधन देना पड़ता है, हर हाल में। जीवन की राहें आसन नहीं होतीं, किसी के लिए भी नहीं।
उसके जीवन की राह भी बड़ी कठिन थी,उसके नियंत्रण से परे। वो अगढ़-अनपढ़ भले ही थी पर बड़ी समझदार थी। वो जानती थी कि राह अगर टेढ़ी-मेढ़ी, पथरीली हो तो भी एक बार को कट ही जाएगी। पर वह सपाट राह जो काई से चिकनी हुई, शैवालों से पटी पड़ी हो, उसका क्या ?और अगर ऐसी फिसलन भरी डगर पर मूंह बके बल गिरना निश्चित हो तो क्या नंगे पांव खड़े हो संतुलन बनाये रखने की चेष्टा करना या चप्पल पहन तुरंत ही गिर पड़ना।

थोड़ी देर यूँ ही बेतरतीब ख्यालों में उलझे रहने के बाद मैंने बहुत दिन घर से बाहर रहने के कारण फ़ोन में जमा हुए वॉइस-मेसेज सुनना शुरू कर दिए। उनमें से एक बड़ी बहन का भी था तो कुछ वक़्त बाद उन्हें ही फ़ोन मिला दिया।
कैसी हो ?
ठीक हूँ। तू कैसा है ?
मैं भी ठीक हूँ।
तेरी आवाज़ थकी हुई सी कैसी लग रही है ?
बस ज़रा-बहुत थकावट है।
बड़ी रात गए फ़ोन किया तूने? सब खैरियत ?
हाँ, आज ही लौटा हूँ हैदराबाद से, तुम्हारा वॉइस-मेसेज था फ़ोन में तो सोचा तुम से ही बात कर लूं।
और क्या चल रहा है ?
कुछ नहीं, अच्छा तुमसे एक बात पूछनी थी।
क्या?
मुझे आजकल धीमरी बहुत दीखती है सपनों में। तुम जानती हो उसके नीम-पागल होने की क्या वजह थी।

सोशल-इंजस्टिस,सामाजिक अन्याय और हम सब में छुपा हुआ सबसे बड़ा भय। तब ज़माना आज के जैसे नहीं था कि एक कैंडल-मार्च निकालो लोग साथ जुड़ जायेंगे, भले ही धीरे-धीरे ही सही। दबंगों की दबंगई से तो आज भी मिडिल-क्लास और छोटा तबका डरता है, तब की तो बात ही छोडो। छोटे शहरों में तथाकथित बदलाव की गुंजाईश ही कहाँ होती थी तब ?
छोटे शहर चुस्त-ट्राउज़र्स की तरह होते हैं। धड से नीचे घुटनों तक इतने चुस्त की हवा भी इकहल्लर नहीं निकल सकती। घुटनों से नीचे जिस हिस्से को थोड़ी आज़ादी होती है वो हिस्सा मध्य-वर्ग का है ,जो चार पैसे जोड़ मौका लगते ही अपने बच्चों को बड़े शहरों की तरफ निकल देते हैं ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह पाए,पर सबसे ज्यादा मार खाता है हमारे यहाँ का निचला तबका। ढंकने को उसके पास कुछ होता नहीं नंगा वो चाह कर भी नहीं हो सकता। बंद पड़े-पड़े ख्यालों में बेड-सोर पैदा हो जाते हैं, कुंठाएं पनप जाती हैं, ज़हन कुंद पड़ जाते हैं।
लूट-डकैती दबंग डालते हैं और पुलिस पकड़ के ले जाती है गरीब घरों के बच्चों को। जिन्हें ये सिस्टम धीरे-धीरे पेशेवर मुजरिम में ढाल देता है। कुछ सालों में ये बच्चे हाव-भाव, चाल-ढाल,शक्ल-सूरत, रंग-रूप में एक जैसे हो जाते हैं। हाँ ये सच है अब समय बदला है और समाज के बड़े प्रोटेगोनिस्ट इन्हीं तबकों से निकलते हैं।
अरे !छोड़ो ये बातें , उसकी बताओ।

ऐन होली से एक रात पहले दबंगों के लड़के खींच कर ले गए थे इसको। रात भर बिना कपड़ों के नचाया इसे। कपड़ों के बदले सौदा तय हुआ मीना का। बाद में खाली पेटीकोट थमा के भेज दिया इसे।
और कोई बोल नहीं मुहल्ले भर से?
सब सोते रहते हैं ऐसे मौकों पर।
और मीना ?
मीना कब लौटी, किस हाल में लौटी ? किसी ने नहीं देखा। जब अम्मा ही महीनों बाद जान पाई तो कोई और क्या जानता?
मुझे क्यों नहीं बताया? मैं लगभग रुआंसा सा बोल।
तुम बंगलौर थे उस वक़्त कॉलेज में। हमें खुद ही बहुत देर से पता चला तो तुम्हें क्या बताते।बाद में सालों बीतने पर लगा की अब बताने का क्या औचित्य ? बाद में अम्मा ही राजघाट जा कर उसका सब सामान बहा आईं थीं। पर कुछ और भेद भी छुपा था उनके मन में जिसे कोई और नहीं जान पाया कभी भी, लोग अक्सर सच छुपा ही जाते हैं। एक बात पता है तुझे, लाल, नीली, पीली, चमकीली, काली, दुनिया में मौजूद और भी जितनी स्याहियां हैं उन सब का इस्तेमाल करके किस्से-कहानियां लिखने वाले जानते हैं कि वो पूरा सच नहीं लिख रहे हैं। चाहे कल्पना का ही नाम क्यों न दें उसे पर अधूरी ही है हर बात। भले ही कागज़ पर लिखी जाये, या रेशम पर, या फिर पत्थर पर ही उकेरी जाये , हर कहानी सच पर एक कलई चढ़ाये रखती है। चाहे मैं लिखूं या कोई और पर पूरा या पूरे जैसा कोई कभी कुछ लिख ही नहीं पाता। सच हमेशा कहानियों में नए-नए कपड़े पहने टुकड़े-टुकड़े में ही आ पाता है। पूरा सच तो अनगढ़, उलझा, लश्तम-पश्तम ताले लगे मन में कहीं पड़ा हुआ सांस लेता रहता है। मजाल है किसी की जो अपने ही मन का ताला खोल सच टटोल सके।

फ़ोन काटने के बाद मैं सन्न, अवाक बैठा रह गया। क्या था ये जो मुझे अभी पता चला ? कोई डरावना सच, या किसी फिक्शन का हिस्सा जो पढ़ा नहीं बस सुना भर हो। किस दर्ज़ा ट्रॉमा होगा। कैसी भयानक सौदेबाज़ी होगी वो? जिस्म के बदले जिस्म उफ़ !। मैं पक्षघात के मरीज सा थम के रह गया। कोई चिकोटी काटे तो भी महसूस न हो।

देखा छोटे लल्ला मैं कहती थी न छोटी जिजी तुम से अच्छा लिख लेती हैं। कैसी सुघराई से सब बता गईं तुम्हें। घबरा के इधर-उधर देखा मैंने, कमरे में कोई नहीं था। डर के मारे कहानी के अध्-लिखे पन्ने फाड़ कर फ्लश-आउट कर दिए मैंने। शांत रात में सिर्फ़ हवाएं बह रहीं थीं , मैंने गौर से कान लगा कर सुना। वो हवाएं एक दर्द-भरा गीत गा रहीं थीं।
“मोरी पतुरियाँ माई गंगे बहा देव
मैं तो चली परदेस मोरे लाल”

Whats Life: A Play

for malathy's life poem

By Malathy Madathilezham

Life is but a play!

The world’s an arena on display
Everyone’s for the limelight, the glitter
We scheme, we cheat, we act!
Masks Masks everywhere
Lies lies everywhere,
Different types of lies!!!
What is real, what is true… unknown
What is favourable, we deem it the truth
Everyone’s truth is different and flexible
We scheme, we cheat, we act!
Masks Masks everywhere
Lies lies everywhere
Different types of lies!!!
Painted faces, dazzling dresses,and oh what fashion!
Cover up, cover up the ugliness within,
And make us the envy of others!!
We scheme, we cheat, we act!
Masks masks everywhere
Lies lies everywhere
Different types of lies!!!
One wrong act! One true step!
And off you go, the stage is no longer for you!
Only the careful and cunning succeed
We scheme, we cheat, we act!
Masks masks everywhere
Lies lies everywhere
Different types of lies!!!
To survive, join the game quick,
Learn the tricks and the bricks of the trade
Learn to dodge and to play!!
We scheme, we cheat, we act!
Masks masks everywhere
Lies lies everywhere
Different types of lies!!!
  • Mask! (angelfacefoundation.wordpress.com)

In Memory of the Poet Laureate on his Birthday – Lord Alfred Tennyson

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Born on August 6 1809, Lord Alfred Tennyson was the poet laureate for two nations – Great Britain and Ireland. Compared to any of his contemporaries, Tennyson seemed the embodiment of his age.

Tennyson first published his compositions as a student in Cambridge. His first publication comprised a collection of boyish rhymes about himself and his brother. However, the major breakthrough in his works came only by 1830, upon the publication of his solo collection titled – Poems Chiefly Lyrical.

Since then, there had been no looking back. By 1842 he had already published two volumes of poems and was living in London. The success of his work Poems made him popular like never before; and eight years down the line in 1850, he was appointed as the Poet Laureate.

A master craftsman in his own right, Tennyson made use of mythological references in most of his works. Subject matters in his works ranged from medieval legends to classical myths – from domestic situations to even nature in its extreme forms. The influence early romantic poets such as John Keats and William Blake is often reflected in the works of this master. An excellent user of rhythm, Tennyson’s use of musical qualities exudes in his lyrical compositions. Use of figures of speech like metaphor, onomatopoeia, assonance and alliteration is prevalent in his works.

Tennyson is considered as one of the great poets of not only the early Victorian Era but also one of the great English Poets, almost at par with likes of Wordsworth or Keats and definitely above many of his Victorian contemporaries.