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Movie Review: Satyagraha: Poor Story Except In Bits

satyagraha_poster

By Ankush Kumar

Cast: Amitabh Bachchan, Ajay Devgn, Kareena Kapoor, & Manoj Bajpayee.

Introduction: The message is loud and clear. And Satyagraha adds no new aspect to the revolution.

Premise: Only if you are news blind, you will miss the fact that this one is based on the Arvind Kejriwal & Anna Hazare movement.

Plot: Dwarka Anand (Amitabh Bachchan) is a school teacher who lives by the Gandhian principles, Maanav Raghvendra (Ajay Devgn) is a NRI business magnet. At the core it’s the story of these two individuals. How a shrewd businessman becomes a nationalist and then becomes part of the revolution.

Acting: Amitabh Bachchan is brilliant as he underplays his character, the portions where he really breaks down with citizen kanesque acts he is let down by his editors, Ajay Devgn disappoints this time though, the punch is missing in his dialogue delivery. Kareena Kapoor looks less of a journalist and more like an add on. The whistles might be heard but Manoj Bajpayee character is becoming caricaturish now. Arjun Rampal has a miniscule role but his heart is worn on his sleeves.

Technical Insight: The script disappoints, Anjum Rajabali can learn a thing or two with changing times, you will feel like re reading the newspapers all over again with very little entertainment value, editing is hopelessly bad, scenes of highest emotions has been killed by lazy edits. Cinematography though is brilliant especially the revolution bit. The music is a sore bore except for Raghupati Raghav Raja Ram. Prakash Jha, maybe out of commercial compulsions gives in, sir atleast once give us a Damul again.

Kela moments: Many actually. The songs weren’t needed. And how on earth Kareena Kapoor is the only journalist covering the agitation?

Citizen Kane moments: Amitabh Bachchan consoling his widowed daughter in law Amrita Rao, the scene where Mr. Bachchan breaks down when he returns to the scene of his son’s death and Mr. Bachchan scene where he tells Devgn he will miss him when he is gone.

Brownie Points: 2.5/5.

kahen ya na kahen

whattosay

By Sharat D.Mathur

jee main aata hai har ik sham koi nazm kahen,

haat ho jate hain bezar, kahen ya na kahen

jee me aata hai ki vahashat ka vo lamha keh dain,

lavz ho jate hain khamosh, kahen ya na kahen

ashk kahtain hain ki gir jayen abhi kagaz par,

aankh jhuk jati hai chupchap, kahen ya na kahen

vo ye kahate hain ki shayar ho tum tumhi keh do

sunane wale hain wohi log, kahen ya na kahen

kuch main kahata hoon to kehtain hain ki kehta hai bohot

kuch na kehane pe bhi ilzam, kahen ya na kahen.

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 3

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– अनघ शर्मा

अपने बचपन में किसी भूगोल की किताब में पढ़ा था कि दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट इंडोनेशिया में हुआ था। इतना बड़ा की उसमें से निकले धुएं के कारण अगले पूरे वर्ष धरती के एक बहुत बड़े हिस्से का तापमान सामान्य से कई गुना नीचे दर्ज़ किया गया था। मैं जब तक उसके पास रहा ये जान ही नहीं पाया की कितना कुछ धधकता है उसके भीतर। अब सोचता हूँ कि अगर उसके भीतर का ज्वालामुखी फट गया होता तो कितने वर्षों के लिए हिम-युग आता। पर न ज्वालामुखी फटा, न ऐसा कुछ हुआ। आख़िरी बार भी बहन ही ने खबर दी थी उसके बारे में।
बड़ी बदल गयी है वो, अजब बुढ़ापा झांकता है उसके चेहरे से अब।
बूढी तो अपनी माँ भी लगने लगी हैं, याद है कितनी खूबसूरत थीं हमारे बचपन में , मैंने कहा।
ब्यूटी इज़ द कर्स। वो बोलीं।
फ़ोन रखने के बाद मैं देर तक उसी की याद में डूबा रहा, पर सिवाय एक धुंधले के कुछ नहीं दीखा। वैसे भी जब से बंगलौर शिफ्ट हुआ हूँ ,घर जाना ही नहीं हो पाया। पिछले दस सालों में तो एक बार भी नहीं जा पाया हूँ। रात की शांत फ़िज़ा बार-बार खुद में यही दोहरा रही थी कि हर इमारत को एक रोज़ खंडर में बदलना ही होता है।
” जानते नहीं ख़ूबसूरती की ज़िल्द पर सबसे पहले जंग लगती है। फिर टुकड़ा-टुकड़ा, पर्त-पर्त ये ज़िल्द खुद ही गल जाती है ……… वर्तमान की जो भी इमारत अपने अतीत में जितनी ज्यादा खूबसूरत रही होगी भविष्य में उसके खंडर बन्ने की आशंका उतनी ही प्रबल होगी। वैसे भी खूबसूरत चेहरों को बदलने में वक़्त ही कहा लगता है? बस एक वक्फ़ा …….

कहाँ तक पहुंचे छोटे लल्ला ?
अजब है तू भी, चित्त- पट्ट का मामला थोड़े है। सिक्का उछालूं, थामूं, देखूं और फ़ैसला हो गया।
तुम तो बहुत बखत बरत रहे हो।
तो क्या किस्सा-कोताही कर दूं ?
तुम से अच्छा तो छोटी जिजी कह-लिख देतीं।
तो फिर उसी के पास जा। हट! परे।
वो उदासी में डूबा हंसता चेहरा ले कर चली गयी। पर जाते-जाते एक भेद पकड़ा गयी कि सबसे पहले हंसते चेहरों की हंसी उतर कर देखनी चाहिए। आजकल उदासी बड़ी चालक हो गयी है। अगर खुश रहना है तो छुपी उदासी को निकाल फेंकना होगा। हाँ पता है उदासी और डर बड़े पक्के होते हैं ,एक बार पकड़ लें तो फिर छोड़ते नहीं। शांत बहते पानी में ज्यों अचानक पहाड़ियां निकल आयें, ऐसे मन पर कब्ज़ा कर लेते हैं ये। कई बार तो यह भय जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं। फिर भी जीवन जीना ही है आखिर तक। जीवन की चाह को लगातार ईधन देना पड़ता है, हर हाल में। जीवन की राहें आसन नहीं होतीं, किसी के लिए भी नहीं।
उसके जीवन की राह भी बड़ी कठिन थी,उसके नियंत्रण से परे। वो अगढ़-अनपढ़ भले ही थी पर बड़ी समझदार थी। वो जानती थी कि राह अगर टेढ़ी-मेढ़ी, पथरीली हो तो भी एक बार को कट ही जाएगी। पर वह सपाट राह जो काई से चिकनी हुई, शैवालों से पटी पड़ी हो, उसका क्या ?और अगर ऐसी फिसलन भरी डगर पर मूंह बके बल गिरना निश्चित हो तो क्या नंगे पांव खड़े हो संतुलन बनाये रखने की चेष्टा करना या चप्पल पहन तुरंत ही गिर पड़ना।

थोड़ी देर यूँ ही बेतरतीब ख्यालों में उलझे रहने के बाद मैंने बहुत दिन घर से बाहर रहने के कारण फ़ोन में जमा हुए वॉइस-मेसेज सुनना शुरू कर दिए। उनमें से एक बड़ी बहन का भी था तो कुछ वक़्त बाद उन्हें ही फ़ोन मिला दिया।
कैसी हो ?
ठीक हूँ। तू कैसा है ?
मैं भी ठीक हूँ।
तेरी आवाज़ थकी हुई सी कैसी लग रही है ?
बस ज़रा-बहुत थकावट है।
बड़ी रात गए फ़ोन किया तूने? सब खैरियत ?
हाँ, आज ही लौटा हूँ हैदराबाद से, तुम्हारा वॉइस-मेसेज था फ़ोन में तो सोचा तुम से ही बात कर लूं।
और क्या चल रहा है ?
कुछ नहीं, अच्छा तुमसे एक बात पूछनी थी।
क्या?
मुझे आजकल धीमरी बहुत दीखती है सपनों में। तुम जानती हो उसके नीम-पागल होने की क्या वजह थी।

सोशल-इंजस्टिस,सामाजिक अन्याय और हम सब में छुपा हुआ सबसे बड़ा भय। तब ज़माना आज के जैसे नहीं था कि एक कैंडल-मार्च निकालो लोग साथ जुड़ जायेंगे, भले ही धीरे-धीरे ही सही। दबंगों की दबंगई से तो आज भी मिडिल-क्लास और छोटा तबका डरता है, तब की तो बात ही छोडो। छोटे शहरों में तथाकथित बदलाव की गुंजाईश ही कहाँ होती थी तब ?
छोटे शहर चुस्त-ट्राउज़र्स की तरह होते हैं। धड से नीचे घुटनों तक इतने चुस्त की हवा भी इकहल्लर नहीं निकल सकती। घुटनों से नीचे जिस हिस्से को थोड़ी आज़ादी होती है वो हिस्सा मध्य-वर्ग का है ,जो चार पैसे जोड़ मौका लगते ही अपने बच्चों को बड़े शहरों की तरफ निकल देते हैं ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह पाए,पर सबसे ज्यादा मार खाता है हमारे यहाँ का निचला तबका। ढंकने को उसके पास कुछ होता नहीं नंगा वो चाह कर भी नहीं हो सकता। बंद पड़े-पड़े ख्यालों में बेड-सोर पैदा हो जाते हैं, कुंठाएं पनप जाती हैं, ज़हन कुंद पड़ जाते हैं।
लूट-डकैती दबंग डालते हैं और पुलिस पकड़ के ले जाती है गरीब घरों के बच्चों को। जिन्हें ये सिस्टम धीरे-धीरे पेशेवर मुजरिम में ढाल देता है। कुछ सालों में ये बच्चे हाव-भाव, चाल-ढाल,शक्ल-सूरत, रंग-रूप में एक जैसे हो जाते हैं। हाँ ये सच है अब समय बदला है और समाज के बड़े प्रोटेगोनिस्ट इन्हीं तबकों से निकलते हैं।
अरे !छोड़ो ये बातें , उसकी बताओ।

ऐन होली से एक रात पहले दबंगों के लड़के खींच कर ले गए थे इसको। रात भर बिना कपड़ों के नचाया इसे। कपड़ों के बदले सौदा तय हुआ मीना का। बाद में खाली पेटीकोट थमा के भेज दिया इसे।
और कोई बोल नहीं मुहल्ले भर से?
सब सोते रहते हैं ऐसे मौकों पर।
और मीना ?
मीना कब लौटी, किस हाल में लौटी ? किसी ने नहीं देखा। जब अम्मा ही महीनों बाद जान पाई तो कोई और क्या जानता?
मुझे क्यों नहीं बताया? मैं लगभग रुआंसा सा बोल।
तुम बंगलौर थे उस वक़्त कॉलेज में। हमें खुद ही बहुत देर से पता चला तो तुम्हें क्या बताते।बाद में सालों बीतने पर लगा की अब बताने का क्या औचित्य ? बाद में अम्मा ही राजघाट जा कर उसका सब सामान बहा आईं थीं। पर कुछ और भेद भी छुपा था उनके मन में जिसे कोई और नहीं जान पाया कभी भी, लोग अक्सर सच छुपा ही जाते हैं। एक बात पता है तुझे, लाल, नीली, पीली, चमकीली, काली, दुनिया में मौजूद और भी जितनी स्याहियां हैं उन सब का इस्तेमाल करके किस्से-कहानियां लिखने वाले जानते हैं कि वो पूरा सच नहीं लिख रहे हैं। चाहे कल्पना का ही नाम क्यों न दें उसे पर अधूरी ही है हर बात। भले ही कागज़ पर लिखी जाये, या रेशम पर, या फिर पत्थर पर ही उकेरी जाये , हर कहानी सच पर एक कलई चढ़ाये रखती है। चाहे मैं लिखूं या कोई और पर पूरा या पूरे जैसा कोई कभी कुछ लिख ही नहीं पाता। सच हमेशा कहानियों में नए-नए कपड़े पहने टुकड़े-टुकड़े में ही आ पाता है। पूरा सच तो अनगढ़, उलझा, लश्तम-पश्तम ताले लगे मन में कहीं पड़ा हुआ सांस लेता रहता है। मजाल है किसी की जो अपने ही मन का ताला खोल सच टटोल सके।

फ़ोन काटने के बाद मैं सन्न, अवाक बैठा रह गया। क्या था ये जो मुझे अभी पता चला ? कोई डरावना सच, या किसी फिक्शन का हिस्सा जो पढ़ा नहीं बस सुना भर हो। किस दर्ज़ा ट्रॉमा होगा। कैसी भयानक सौदेबाज़ी होगी वो? जिस्म के बदले जिस्म उफ़ !। मैं पक्षघात के मरीज सा थम के रह गया। कोई चिकोटी काटे तो भी महसूस न हो।

देखा छोटे लल्ला मैं कहती थी न छोटी जिजी तुम से अच्छा लिख लेती हैं। कैसी सुघराई से सब बता गईं तुम्हें। घबरा के इधर-उधर देखा मैंने, कमरे में कोई नहीं था। डर के मारे कहानी के अध्-लिखे पन्ने फाड़ कर फ्लश-आउट कर दिए मैंने। शांत रात में सिर्फ़ हवाएं बह रहीं थीं , मैंने गौर से कान लगा कर सुना। वो हवाएं एक दर्द-भरा गीत गा रहीं थीं।
“मोरी पतुरियाँ माई गंगे बहा देव
मैं तो चली परदेस मोरे लाल”

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 2

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– अनघ शर्मा

मुझे हमेशा यूँ ही लगता था की उसका मन बेतवा के ढाल सा होगा।हमेशा साफ़, भरा और छलछलाता हुआ। चाहे कितना ही सूखा क्यों न आ जाये, पर मन के स्नेह का स्रोत हमेशा लबालब भरा हुआ रहेगा। पर लबालब भरे स्रोत से भी कई बार प्यासा ही लौटना पड़ता है।
उन दिनों दो बड़े बदलाव हो रहे थे मुझमें पहला तो होठों के ऊपर मूछों की लकीर उभर रही थी, और दूसरा मन भीतर एक कहानीकार बेचैन सा करवटें ले रहा था। सो एक दिन उसी धुन में मैं उससे कह बैठा। मैं एक दिन तुम्हारी भी कहानी लिखूंगा धीमरी।
क्या तय हुआ था ? पूर नाम, असली नाम छोटे लल्ला।
अच्छा ठीक है, नैनतारा। अब खुश ?
कहानी लिखना क्या इतना आसान होता है छोटे लल्ला ? बीस-पचीस बरस इंतज़ार करो, जब हमें भूल जाओ, हमारे कने दिमाग पे ज़ोर डालना पड़े तब लिखना।
चलो ये भी तय रहा, सो अब न शक्ल याद न आवाज़।
जाने-अनजाने जिंदगी की तरफ कभी कोई शर्त उछालो तो वो उसे एक ही बार में कैच कर लेती है, लपक लेती है, और फिर हर बीतते समय के साथ उसकी आवाज़ मंद पड़ जाती है पर एक आवाज़ कभी मंद नहीं पड़ी।
यूँ भी ज़िंदगी जो मसौदे तैयार करती है, ख़ाका खींचती है। आदमी की आरज़ू उसे दो कौड़ी का मान सिरे से नकार देती है, धड़े से ख़ारिज कर देती है। और जो चार सतरें चोरी-छुपे आरज़ू किसी लिफ़ाफे में भेजती है, उसे ज़िंदगी बड़ी होशियारी से गायब कर देती है, या पूरा मौजूं ही बदल देती है। आखिर में जीत ज़िंदगी की ही होती है।
उसकी ज़िंदगी के मसौदे उसकी आरज़ू से जीत गए।
………………………

ऐ धीमरी हमारे लड़के का कान बह रहा है कई दिन से ?
जिजी बबूल के फूल सरसों के तेल में पका कर ठंडा तेल दिन में तीन बार डालो, एक दिन में कान बहना बंद।
अच्छा धीमरी और मेरे लड़के का कान दुःख रहा है रात से।
लो बहन ,किसी जच्चा का दूध डाल दो थोडा सा दर्द ये गया वो गया।
धत ! पगली
ऐसे तमाम नुस्खे उसकी अंटी में बंधे रहते थे। बड़ी धीमी-धीमी आवाज़ में एक गीत गया करती थी।
” भौंरा भनर-भनर होय मेरी गुइंयाँ / गजरा लहर-लहर होय मेरी गुइंयाँ
जब मोरे राजा पिया आयें अटरिया / जियरा धुकुर-पुकुर होय मेरी गुइंयाँ “

ऐं छोटे लल्ला, क्या सारी कहानी हम पर ही लिखोगे ? अपनी भी कुछ कहो।
अपनी क्या कहें कुल जमा आठ सतरें लिखे तो हो गयी पूरी कहानी।
ऐसे न बनेगी बात।
अच्छा सुनो। भरा-पूरा परिवार था, बाद में बाप जाते रहे। दिन बदले, थोड़े बिगड़े-थोड़े बने और रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी चल निकली।
ये तो कोई बात न हुई। कहानी में ख़ास बातें होती हैं। कुछ ख़ास हो तो बोलो छोटे लल्ला।
ख़ास क्या ? हाँ ज़ब्त बहुत था हमें,होता भी क्यों न ? माँ-बाप को ख़ासा ज़ब्त था। खूब गालियाँ सुनी दोनों ने घर वालों की। पिता ने तो मरने के बाद भी खूब सुनी। पैसे से कमज़ोर आदमी को सबसे ज्यादा मार अपने घर के अन्दर ही सहनी पड़ती है। ये न समझना की हमें प्यार न मिला। बहुत मिला,टूट-टूट मिला पर कम लोगों से। बाकी लोगों से दिली नहीं काम चलाऊ सा मिला। सो यूँ कुछ वाकयों से कुछ लोग दिल से उतर गए। उतरे तो फिर कभी न चढ़े।
अच्छा छोडो हमारी। अपनी पर आओ, ये कहानी तुम्हारी है। बातें मत उलझाओ।
अच्छा ये बताओ तुम वहां से भाग क्यों आयीं ?
बताते हैं सबर रखो। पहले वादा करो हमारी कहानी में एक किस्सा है ,उसका ज़िक्र न करोगे।
पागल हो क्या ? उसका ज़िक्र कैसे न होगा ? सब उसी पर तो टिका है इस कहानी का। वैसे भी आदमी की फ़ितरत होती है, इधर-उधर से जोड़-जाड़ अपनी समझ लायक कुछ ठीक-ठाक सा किस्सा बना ही लेता है।
तुम्हें मालूम ही नहीं , छोटी जिजी जानती हैं सब।
मैं पूछ लूँगा उनसे। समझी।
वो चुप बैठी मेरा चेहरा ताकती रही।
खट से मेरी नींद खुल गयी। सपना ही तो था ये, आँख खुली और हवा हो गया।
……………………………

वो वहाँ से क्यों भाग आई थी ? ये हममें से कोई नहीं जनता था। पर उसे माँ से कई बार ये कहते सुना था।
” जानती हो जिजी कोई औरत दो बातों बिना अपने ठिये से नहीं भागती। अपने पेट और पीठ, या तो पेट की औलाद पर आंच होगी या अपनी पीठ भारी होगी। “
अब सोचता हूँ पीठ तो कभी भारी रही नहीं होगी उसकी। उसके भागने में जरूर पहले वाली बात ही होगी।
माँ से उसकी दोस्ती का किस्सा भी अजीब था। सालों पहले एक दो-तीन बरस की बच्ची के साथ वो हमारी मौसी को आगरा बस-अड्डे पर मिली थी। सो वहां से पहले उनके घर और बाद में हमारे घर आ गई सदा के लिए, और हमारे जीवन में रच-बस गई जैसे गर्मियों की धूप और सर्दियों का कोहरा।
बाद में समय की दौड़ से क़दम मिलाने के लिए हम भी बाहर चले गए। महीनों घर नहीं आते थे, जो कभी आते भी तो अपने-अपने में मश्गूल रहते थे।
एक बार कॉलेज की छुट्टियों में जब घर गया तो उसकी बेटी को न पा कर बड़ा आश्चर्य हुआ मुझे।
मीना कहाँ है? मैंने पूछा।
चली गयी।
कहाँ ?
अपने सासरे और कहाँ ?
ऐं ! पागल है क्या ? ब्याह होता तो हमें पता न चलता क्या ?
हमारे सासरे गयी थी, वहीं हो गया।
कुल तेरह-चौदह की तो थी। इतनी छोटी का ?
हमारे यहाँ इतने का ही होता है।
और हाँ !तेरा ही कौन सासरा बचा है दुनिया में ?
उसने एक कातर दृष्टि से माँ को देखा और अन्दर चली गयी।
क्या हुआ इसे ?
कुछ नहीं, बीमार थी कई दिनों से।
क्या बीमारी थी ?
औरतों की बात है, तुम्हें क्या बताएं। माँ ने कहा तो मैं चुप हो गया. यह भी भली बात थी की औरतों की बात में मेरा क्या काम ? फिर यूँ भी एक छोटे से वाक्य में निहितार्थ क्या ढूंढना ?
पर सालों बाद वो खुद ही अधूरी बात का सूत्र थम गयी।
……………………

ऐं, छोटे लल्ला रंगीन अखबार है ?
अखबार, क्या करेगी ?
कुछ रखना है।
क्या ?
पेटीकोट।
नहीं है, मैं झूठ बोल गया। हांलाकि मेरे पलंग के गद्दे के नीचे खूब रंगीन अखबार रखे रहते थे। फिल्मों का बहुत शौक़ था मुझे, और अखबार में इतवार के इतवार एक रंगीन फ़िल्मी पन्ना आता था।
झूठ क्यों बोलते हो? गद्दे के नीचे रखे तो रहते हो। एक-दो दे दो।
ले मर ! मैंने झटके से हाथ पटका। आह !हाथ झंझनाता हुआ पलंग के पाये से जा टकराया। ये भी सपना था, टूट गया। सपने बहुत आते थे मुझे कहानियों में या सपनों में कहानियां। सपने और कहानियां मुझे आते थे और उन्हें लिखने का शऊर बड़ी बहन को।

बड़ी दी उन दिनों मानवीय रिश्तों के तमाम आकलन करती कहानियां लिख रही थीं। पर उसका आकलन करना बड़ा मुश्किल और पेचीदा काम था , ठीक वैसे ही जैसे बकरियों की सवारी पर कोई रेगिस्तान पार करना।

“कोटेड और अनकोटेड बातों के बीच की लकीर, सड़क के तारकोल में फंसे छोटे-छोटे पत्थरों की लिपि और किनारे तक जा कर डूबने वाले आसमान को पढने वाले एक रोज़ बड़े अकेले रह जाते हैं। “
या फिर ये
” पीछे उतर के देखो, तारीख़ में गहरे बहुत गहरे जा कर देखो दस, बीस, सौ, दो-सौ, चार-सौ बरस पीछे जा कर देखो कि एक शाहकार के पैदा होने के लिए और कितनों को पैदा होना पड़ता है। यकीं न आये तो पूछो मुमताज से की एक ताजमहल के पैदा होने के लिए किस-किस को पैदा होना पड़ा था। एक शाहजहाँ को, एक दारा को, एक औरंगज़ेब को, एक शुजा को …… और भी न जाने कौन-कौन ??”
पर उसमें ऐसी कोई खूबी नहीं थी। न वो मुमताज थी न किसी शाहकार को पैदा कर सकती थी। न वो कथ्य-अकथ्य के बीच की पंक्ति ही पढ़ पाई थी। न जीवन भर चलने वाली सड़कों में फंसे पत्थरों की लिपि। न ही डूबते आसमानों के किनारे। फिर भी अंततः बहुत अकेली रह गई थी वो। बहुत पहले ये भी मुझे बहन ने ही बताया था कि वो धीरे-धीरे अपना मानसिक संतुलन खोती जा रही है।

 

 

 

 

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 1

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– अनघ शर्मा

” जब मोरे राजा पिया गये हैं बगीचा
भौंरा भनर-भनर होये मेरी गुइंयाँ ”
लक-दक करके दामन से झाड़ो तो अनगिनत यादें झड जाती हैं। पर ये भी तो सच ही है कि इतनी आसानी से कभी कोई याद भी नहीं आता। दिली तौर पर याद करना और ज़हनी तौर पर याद करना दोनों अलग-अलग हैं, फिर भी कुछ यादें ज़हन और दिल के बीच कहीं अटकी रहती हैं। उसकी याद भी कुछ ऐसी ही थी, कहीं ज़हन और दिल के बीच सुस्त पड़ी। पर एक कोशिश तो करनी ही थी इसे निकालने की। सो ये तय हुआ कि यादों के तोशखाने में से एक रजाई निकाली जाये। फिर रात भर कोई याद ओढ़ो। पुरानी याद की धुंधली गंध रिसते-रिसते दिल के तहख़ाने में बैठ जायेगी। यूँ एक कहानी के जन्म की बात होगी …… शर्त ये कि पैदाइश तक रजाई तोशखाने में वापस न रखी जाए।

उसकी तो पूरी कहानी ही शर्तों पे टिकी हुई थी।
पहली शर्त ये की …
“उसे उसके असली नाम से बुलाया जाये न कि लोक-प्रचलित धीमरी से ”
दूसरी ये की …….
“वो कहाँ से है ये कोई न जान पाए ”
दूसरी शर्त तो जायज़ है। पर पहली,भला ये भी कोई बात हुई,असली नाम से पुकारें। उसके माँ-बाप या हमारी माँ को छोड़ इक्का-दुक्का ही कोई होगा जो उसका असली नाम जनता होगा। सभी तो उसे धीमरी कह कर बुलाते थे, अब इस नाम में क्या बुराई है भला ?
बुराई है,यह बड़ा व्यक्ति -वाचक है।एक बार लो तो तमाम दुनिया जान जाये। सो असली नाम छद्म पहचान का काम करेगा। न लिखने वाले के मन पे ही कोई बोझ और न उसके ही मन पर।
कई बार बड़ी बहन से कहा तुम ही लिख मारो उसकी कहानी। किस्से-कहानियों में तुम्हारा हाथ सधा हुआ है। पूरा न्याय कर पाओगी उस के साथ, जैसे अनुभवी शल्य चिकित्सक के हाथों त्वचा को सिलने में टांका इंच भर भी इधर-उधर नहीं होता, ठीक वैसे ही।
सो हर बार की तरह वही एक जवाब। अरे ! उस पर कहानी लिखना कोई डबल रोटी का टुकड़ा खाने जैसा है क्या ? कि जैम नहीं तो न सही मार्मलेड लगा कर खा लेंगे। ये तो याद है, ठीक नमक की तरह, अगर स्वाद लेना हो तो खुद ही चखना पड़ता है। बाकी मौका-बेमौका, वक़्त-बेवक्त तुम्हें ठोंक-पीट कर दुरुस्त करते रहेंगे। फिर तुम्हारी यारी-दोस्ती भी थी उसके साथ सो तुम्ही लिखो।
अजी क्या ख़ाक दोस्ती थी ? असल नाम तक तो याद नहीं हमें उसका। करो, अब करो दुरुस्त ??
अच्छा याद कर जब वो कोई काम बिगाड़ देती थी तो क्या कहती थीं अम्मा ?
“एक काम भी ठीक से नहीं होता तुझसे, वही हाल है तेरा आँख के अंधे नाम नयनसुख। आँखें है या बुझते दिये, देख के भी नहीं चलती। ”
ये अलग बात है कि नज़र उसकी पाक-साफ़ 6/6 थी।
तो पहली शर्त के लिहाज़ से उसका नाम नैनतारा था।
उसकी जो सबसे स्पष्ट याद है,वही बड़ी धुंधली है। चेहरा-मोहरा, कद-काठी तो अब याद नहीं ढंग से, मगर कुछ याद है तो उसके कॉलर-बोन के गड्ढे। वो इतने बड़े और इतने गहरे थे कि मुझे हमेशा लगता था जैसे दो सूखे हुए तालाब हों, और कभी इनमें बेतवा का साफ़-ठंडा पानी भरा रहता होगा। बेतवा इस लिए की दूसरी शर्त के लिहाज़ से वो ऐसे इलाके से भाग कर आई थी,जो कहीं बेतवा किनारे था।

5 All-Time Favourite Bollywood Friendships

No matter whether they are off-screen or what type of their relationships they share in real life, but these on-screen friendship stories have been a hot favorite amongst the viewers. Kushal Sakunia brings to you your favourite friendship jodis.

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1. Sholay – Amitabh & Dharmendra (1975)

The first film that comes to mind when we think friendship is of course Sholay. The title role of Jay and Viru excellently played by Amitabh Bachchan and Dharmendra respectively would etch into your hearts permanently post viewing this classic film and the song “Yeh Dosti”.

Dosti

2. Dosti – Sudhir Kumar & Sushil Kumar (1964)

Another classic from the golden period of Indian cinema that will touch your emotional chord is ‘Dosti’. Starring Sudhir Kumar and Sushil Kumar, the film is the story of two friends who help each other out even in the face of extreme hardship.

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3. Rang De Basanti – Aamir Khan, Sharman Joshi, Kunal Kapoor, Madhavan, Soha Ali Khan (2006)

Fresh faces and an inimitable storyline including friendship, war against corruption and political distress made Rang De Basanti an apt film for the times. It had an incredible story about friendship which the youth of today can relate to. RDB is a must watch this weekend with your friends.

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4. Dil Chahta Hai – Aamir Khan, Saif Ali Khan and Akshaye Khanna (2001)

The only film that revolves completely around friends and friendship is Dil Chahta Hai. The three lead characters are the epitomes of true friends, but circumstances drift them apart and the film essentially tries to establish that whatever complicated situations come in one’s life, it’s absolutely impossible to break the bond of a true friendship.

three idiots

5. 3 Idiots – Aamir Khan, Sharman Joshi & Madhavan (2009)

The story of 3 Idiots is a entertaining journey of three friends who try to explore themselves and share them unforgettable experiences.  It dealt with the education system in India and the bond between three engineering students in a premier institution of engineering. It also showed how if one followed his dreams, fame and family and friends will never leave his or her side.

RIP Bollywood’s Star Villain

By Ankush Kumar

Alfred Hitchcock once said ‘cinema is the most beautiful fraud in the world’. What he possibly did not predict was the attitude of those involved in the celluloid industry. Today Hindi cinema popularly known as Bollywood celebrates 100 years of cinema. In this centenary period, Hindi cinema has seen some great body of works, some charming personalities and some classic tragedies. One thing though that stays is the indifference towards stalwarts and how fraudulent is the behavior of actors towards the true treasures of the industry. With every passing year one after another gems have transcended into the lap of God, yet our current crop of industry wallahs don’t seem to get the message that ‘the arc lights will not last forever’.

Pran Saab breathed his last yesterday, a man who contributed seventy years to an industry that is just 100 years old. These were the few good men who were the strong pillars of our cinema world. Yet on his last journey very few came. In the age of social media, just tweeting is an ugly way to express solidarity to men like him who gave these new actors a reason to act. But that is how this industry has behaved not just with Pran Sir but many others. There have been many gems like Raj Khosla, Manmohan Desai, Prakash Mehra, Mehmood, Guru Dutt who have died in the confines of loneliness and none have least cared in their final journey.

I have absolutely no intentions of drawing comparisons but when Priyanka Chopra’s father died, the entire film fraternity poured in and scribes had a field day. The man had zilch contribution to our cinema and today when a legend left us almost none came. This is how it works here, behind those sunglasses at funerals is bloodshot red eyes because of alcohol, behind every appearance is a chance to publicize an upcoming film, behind every byte is one shot at fame. They came in large numbers at her father’s funeral because she is hot property today. They will continue to come if they get something in return else this industry will continue to behave in switch on and switch off mode.

P.S: Iss Jagat Ka Yehi Dastoor Raha Hai; Jinhone Jitni Oonchai Dekhi Hai; Unki Aakhri Bidaiii Utni Hi Dukhad Rahi Hai. RIP Sher Dil Pran Sir !

Lootera Review: Good Story And Solid Performances

lootera

 

By Ankush Kumar

On the outset Lootera is a ‘flawed gem filled with glorious emotions’. A story set in the 1950’s; Vikram Motwane has put his writing skills to good effect by tactfully incorporating O Henry’s short story ‘The last leaf’.

A zamindar father dotes on his asthamic daughter, aloof of the immediate threat of his property being confiscated by the government. Enter a suave charmer and the inevitable happens. Cupid strikes.

Ranveer & Sonakshi make an odd pair, but it’s the uneven edges in their chemistry that makes them so loveable. The journey of being in love; nursing heartbreak and reinventing love all over again in a span of one year makes the plot of this romantic thriller.

Performance wise the workshops created by the director is visible in the acting of the lead protagonists. The character actors ably support the flow of the movie.

What is breathtaking though is the cinematography and art designing of the film. The portrayal of vintage cars, opulent havelis and mesmerizing visuals of Dalhousie makes the film worthy of praise. The lyrics penned by Amitabh Bhattacharya, soulful music by Amit Trivedi makes you feel as if you are watching ‘Poetry in motion’. Vikramaditya Motwane has moved a notch higher after his first outing as a director. Lootera is a near perfect film that will have an after effect for days to come.

P.S: If technology drives you, snazzy camerawork is staple diet for you, then you are reading the wrong review. For all others enjoy the weekend. Lootera will make it special.

Rating: 3.5/5

Lootera (2013) Movie First Look Poster

 

 

 

तू खूबसूरत है बहोत

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By Syed Bilal

तू खूबसूरत है बहोत

जानती है क्या !
संगेमरमरी मूरत है तू
पहचानती है क्या !
पलकों में तेरी सुबह की
आहट कुबुलाती है
नैन जब खुलते है तेरे
तो सुबहा  मुस्कुराती है ,
मेरी सुबहा और शाम है तू
जानती है क्या !
मेरी सुराही मेरा जाम है तू
पहचानती है क्या !
तू चाँद की करवट है
नदिया का पनघट है
दरिया की सरहद है
जानती है क्या !
रोते हुए चेहरे पे
हसी की दस्तक है
पहचानती है क्या !
आँखें है तेरी दो दीये
रोशन सा इनमे नूर है
मुड़कर जो देखे जिस तरफ
दीवाली छोड़ जाती है
जानती है क्या !
बाहें फैला जो खड़ी होती तू
बारिश तुझपे उतर आती है
पहचानती है क्या !
आपका :
बिलाल

Ghanchakkar Review: Meat Missing From Story

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By Ankush Kumar

The one thing that is common between the intelligent filmmakers of Bollywood, the dumb ones and the pseudos’ is their love for the disease called Amnesia. The pseudos’ mostly get this one right because their audiences are equally mushy and stupid.

The dumb ones have little options but it’s the intelligent ones that goes horribly wrong. When expectations from a cult filmmaker are massive and you are treated to an overdose of amnesia the end result is ‘Ghanchakkar’.

Loosely inspired by the Danny Boyle film trance where a man robs a painting and forgets this one has money as its subject. But as it has happened umpteen times an inspiration with dash of Bollywood clichés and the movie gives its audience a burst of amnesia at the end.

The movie starts perfectly well. Setu has shot the bank heist brilliantly. Quirky humor, stellar performances and bouncy music gives you a hope that delicious biryani is being cooked. But beyond the first hour the movie begins to fizzle out. Repeated gags and the film starts to choke. In the end you feel cheated when you realize that bharta has been served instead of biryani.

On the acting front Emraan Hashmi is honest to his role, Vidya Balan is brilliant playing a boisterous Punjabi housewife whose fashion sense will give complex to the behenjis from Delhi. But it’s the funny don who is a stand out in the entire movie.

Raj Kumar Gupta is better of picking up real life issues than making a mockery of short stories. In the end you can only hope that the intelligence will return in the future. For the moment though the meat is missing.

ghanchakkar