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The Great Indian (Before) Marriage Tamasha – Part 4

By  Shwetha Kalyanasundaram

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The last blog post (in this series) ended with the following question “So what happens if the horoscope matches?!?” Read on…

If the horoscopes match at both ends, one moves onto a phase where you try to get to know each other!! This is done to see if they are compatible with each other. Well, in most cases, the two people involved are always going to be at their best behaviour, giving stereotypical answers, in an attempt to impress the other person.

Questions are asked on a variety of topics and hypothetical situations are drawn and one is gauged on the answers given and the level of compatibility is measured based on these answers!! Practically speaking, people tend to behave in a completely different manner, when faced with the actual situation. And one’s thought process is going to change as you mature and one is going to act according to the situation at that point of time. Given this, how will you know you are choosing the right person as your life partner?!?

Pondering over this question, I finally drew my own conclusion and here it is: (mind you, the next few portions can be serious!)

There’s always the pending fear and anxiety of things going wrong. The person you are trying to match needn’t necessarily portray their true nature. The whole act might be pre-mediated in an effort to create impression. Even assuming that the true nature is always portrayed, human character is still amenable to change with growing years.
It’s hard to judge a person based on a finite set of questions however hypothetical it may be.

I would like to draw a similarity with that of a job interview. If 3 people were being interviewed for one position and all of them seemed technically strong with good credentials, then it’s a tough call right? In that situation I would go for the one with that extra zeal, motivation and rapport. (Psst…Behavioural reasoning would help me weed through this.)

You make a choice based on your essential needs and requirements which absolutely cannot be compromised – your core values. How do you gauge that this person isn’t pretending to possess those? You observe how they behave in their surroundings and with their surroundings. You follow their journey to the current destination which should usually serve as a predictor to where things will proceed. But remember that there will always be forces beyond your control that can cause disruptions and distress.

That would explain why horoscopes are so heavily relied on. By placing your faith and fate on an astrologer you are essentially alleviating the anxiety levels and creating self-assurance on a secure future. Hell, I have seen things go wrong even with horoscope match.  Remember, humans are innately good. It’s how each person reacts to different circumstances that define their character.

Hence proof that I m a thorough Human Resources professional! *chuckle*

After years of the groom hunt, I finally found my man. And yes, I did have my share of “flashing bulbs” and “ringing bells” moments that I believe are supposed to happen when you come across your soul mate. And a definite proof that it takes just over two and half minutes to decide your soul mate!! (A recent research quotes this!)

I now truly believe in destiny!

And as every fairy tale ends, we live happily ever after!!!

लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 3

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– अनघ शर्मा

अपने बचपन में किसी भूगोल की किताब में पढ़ा था कि दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट इंडोनेशिया में हुआ था। इतना बड़ा की उसमें से निकले धुएं के कारण अगले पूरे वर्ष धरती के एक बहुत बड़े हिस्से का तापमान सामान्य से कई गुना नीचे दर्ज़ किया गया था। मैं जब तक उसके पास रहा ये जान ही नहीं पाया की कितना कुछ धधकता है उसके भीतर। अब सोचता हूँ कि अगर उसके भीतर का ज्वालामुखी फट गया होता तो कितने वर्षों के लिए हिम-युग आता। पर न ज्वालामुखी फटा, न ऐसा कुछ हुआ। आख़िरी बार भी बहन ही ने खबर दी थी उसके बारे में।
बड़ी बदल गयी है वो, अजब बुढ़ापा झांकता है उसके चेहरे से अब।
बूढी तो अपनी माँ भी लगने लगी हैं, याद है कितनी खूबसूरत थीं हमारे बचपन में , मैंने कहा।
ब्यूटी इज़ द कर्स। वो बोलीं।
फ़ोन रखने के बाद मैं देर तक उसी की याद में डूबा रहा, पर सिवाय एक धुंधले के कुछ नहीं दीखा। वैसे भी जब से बंगलौर शिफ्ट हुआ हूँ ,घर जाना ही नहीं हो पाया। पिछले दस सालों में तो एक बार भी नहीं जा पाया हूँ। रात की शांत फ़िज़ा बार-बार खुद में यही दोहरा रही थी कि हर इमारत को एक रोज़ खंडर में बदलना ही होता है।
” जानते नहीं ख़ूबसूरती की ज़िल्द पर सबसे पहले जंग लगती है। फिर टुकड़ा-टुकड़ा, पर्त-पर्त ये ज़िल्द खुद ही गल जाती है ……… वर्तमान की जो भी इमारत अपने अतीत में जितनी ज्यादा खूबसूरत रही होगी भविष्य में उसके खंडर बन्ने की आशंका उतनी ही प्रबल होगी। वैसे भी खूबसूरत चेहरों को बदलने में वक़्त ही कहा लगता है? बस एक वक्फ़ा …….

कहाँ तक पहुंचे छोटे लल्ला ?
अजब है तू भी, चित्त- पट्ट का मामला थोड़े है। सिक्का उछालूं, थामूं, देखूं और फ़ैसला हो गया।
तुम तो बहुत बखत बरत रहे हो।
तो क्या किस्सा-कोताही कर दूं ?
तुम से अच्छा तो छोटी जिजी कह-लिख देतीं।
तो फिर उसी के पास जा। हट! परे।
वो उदासी में डूबा हंसता चेहरा ले कर चली गयी। पर जाते-जाते एक भेद पकड़ा गयी कि सबसे पहले हंसते चेहरों की हंसी उतर कर देखनी चाहिए। आजकल उदासी बड़ी चालक हो गयी है। अगर खुश रहना है तो छुपी उदासी को निकाल फेंकना होगा। हाँ पता है उदासी और डर बड़े पक्के होते हैं ,एक बार पकड़ लें तो फिर छोड़ते नहीं। शांत बहते पानी में ज्यों अचानक पहाड़ियां निकल आयें, ऐसे मन पर कब्ज़ा कर लेते हैं ये। कई बार तो यह भय जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं। फिर भी जीवन जीना ही है आखिर तक। जीवन की चाह को लगातार ईधन देना पड़ता है, हर हाल में। जीवन की राहें आसन नहीं होतीं, किसी के लिए भी नहीं।
उसके जीवन की राह भी बड़ी कठिन थी,उसके नियंत्रण से परे। वो अगढ़-अनपढ़ भले ही थी पर बड़ी समझदार थी। वो जानती थी कि राह अगर टेढ़ी-मेढ़ी, पथरीली हो तो भी एक बार को कट ही जाएगी। पर वह सपाट राह जो काई से चिकनी हुई, शैवालों से पटी पड़ी हो, उसका क्या ?और अगर ऐसी फिसलन भरी डगर पर मूंह बके बल गिरना निश्चित हो तो क्या नंगे पांव खड़े हो संतुलन बनाये रखने की चेष्टा करना या चप्पल पहन तुरंत ही गिर पड़ना।

थोड़ी देर यूँ ही बेतरतीब ख्यालों में उलझे रहने के बाद मैंने बहुत दिन घर से बाहर रहने के कारण फ़ोन में जमा हुए वॉइस-मेसेज सुनना शुरू कर दिए। उनमें से एक बड़ी बहन का भी था तो कुछ वक़्त बाद उन्हें ही फ़ोन मिला दिया।
कैसी हो ?
ठीक हूँ। तू कैसा है ?
मैं भी ठीक हूँ।
तेरी आवाज़ थकी हुई सी कैसी लग रही है ?
बस ज़रा-बहुत थकावट है।
बड़ी रात गए फ़ोन किया तूने? सब खैरियत ?
हाँ, आज ही लौटा हूँ हैदराबाद से, तुम्हारा वॉइस-मेसेज था फ़ोन में तो सोचा तुम से ही बात कर लूं।
और क्या चल रहा है ?
कुछ नहीं, अच्छा तुमसे एक बात पूछनी थी।
क्या?
मुझे आजकल धीमरी बहुत दीखती है सपनों में। तुम जानती हो उसके नीम-पागल होने की क्या वजह थी।

सोशल-इंजस्टिस,सामाजिक अन्याय और हम सब में छुपा हुआ सबसे बड़ा भय। तब ज़माना आज के जैसे नहीं था कि एक कैंडल-मार्च निकालो लोग साथ जुड़ जायेंगे, भले ही धीरे-धीरे ही सही। दबंगों की दबंगई से तो आज भी मिडिल-क्लास और छोटा तबका डरता है, तब की तो बात ही छोडो। छोटे शहरों में तथाकथित बदलाव की गुंजाईश ही कहाँ होती थी तब ?
छोटे शहर चुस्त-ट्राउज़र्स की तरह होते हैं। धड से नीचे घुटनों तक इतने चुस्त की हवा भी इकहल्लर नहीं निकल सकती। घुटनों से नीचे जिस हिस्से को थोड़ी आज़ादी होती है वो हिस्सा मध्य-वर्ग का है ,जो चार पैसे जोड़ मौका लगते ही अपने बच्चों को बड़े शहरों की तरफ निकल देते हैं ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह पाए,पर सबसे ज्यादा मार खाता है हमारे यहाँ का निचला तबका। ढंकने को उसके पास कुछ होता नहीं नंगा वो चाह कर भी नहीं हो सकता। बंद पड़े-पड़े ख्यालों में बेड-सोर पैदा हो जाते हैं, कुंठाएं पनप जाती हैं, ज़हन कुंद पड़ जाते हैं।
लूट-डकैती दबंग डालते हैं और पुलिस पकड़ के ले जाती है गरीब घरों के बच्चों को। जिन्हें ये सिस्टम धीरे-धीरे पेशेवर मुजरिम में ढाल देता है। कुछ सालों में ये बच्चे हाव-भाव, चाल-ढाल,शक्ल-सूरत, रंग-रूप में एक जैसे हो जाते हैं। हाँ ये सच है अब समय बदला है और समाज के बड़े प्रोटेगोनिस्ट इन्हीं तबकों से निकलते हैं।
अरे !छोड़ो ये बातें , उसकी बताओ।

ऐन होली से एक रात पहले दबंगों के लड़के खींच कर ले गए थे इसको। रात भर बिना कपड़ों के नचाया इसे। कपड़ों के बदले सौदा तय हुआ मीना का। बाद में खाली पेटीकोट थमा के भेज दिया इसे।
और कोई बोल नहीं मुहल्ले भर से?
सब सोते रहते हैं ऐसे मौकों पर।
और मीना ?
मीना कब लौटी, किस हाल में लौटी ? किसी ने नहीं देखा। जब अम्मा ही महीनों बाद जान पाई तो कोई और क्या जानता?
मुझे क्यों नहीं बताया? मैं लगभग रुआंसा सा बोल।
तुम बंगलौर थे उस वक़्त कॉलेज में। हमें खुद ही बहुत देर से पता चला तो तुम्हें क्या बताते।बाद में सालों बीतने पर लगा की अब बताने का क्या औचित्य ? बाद में अम्मा ही राजघाट जा कर उसका सब सामान बहा आईं थीं। पर कुछ और भेद भी छुपा था उनके मन में जिसे कोई और नहीं जान पाया कभी भी, लोग अक्सर सच छुपा ही जाते हैं। एक बात पता है तुझे, लाल, नीली, पीली, चमकीली, काली, दुनिया में मौजूद और भी जितनी स्याहियां हैं उन सब का इस्तेमाल करके किस्से-कहानियां लिखने वाले जानते हैं कि वो पूरा सच नहीं लिख रहे हैं। चाहे कल्पना का ही नाम क्यों न दें उसे पर अधूरी ही है हर बात। भले ही कागज़ पर लिखी जाये, या रेशम पर, या फिर पत्थर पर ही उकेरी जाये , हर कहानी सच पर एक कलई चढ़ाये रखती है। चाहे मैं लिखूं या कोई और पर पूरा या पूरे जैसा कोई कभी कुछ लिख ही नहीं पाता। सच हमेशा कहानियों में नए-नए कपड़े पहने टुकड़े-टुकड़े में ही आ पाता है। पूरा सच तो अनगढ़, उलझा, लश्तम-पश्तम ताले लगे मन में कहीं पड़ा हुआ सांस लेता रहता है। मजाल है किसी की जो अपने ही मन का ताला खोल सच टटोल सके।

फ़ोन काटने के बाद मैं सन्न, अवाक बैठा रह गया। क्या था ये जो मुझे अभी पता चला ? कोई डरावना सच, या किसी फिक्शन का हिस्सा जो पढ़ा नहीं बस सुना भर हो। किस दर्ज़ा ट्रॉमा होगा। कैसी भयानक सौदेबाज़ी होगी वो? जिस्म के बदले जिस्म उफ़ !। मैं पक्षघात के मरीज सा थम के रह गया। कोई चिकोटी काटे तो भी महसूस न हो।

देखा छोटे लल्ला मैं कहती थी न छोटी जिजी तुम से अच्छा लिख लेती हैं। कैसी सुघराई से सब बता गईं तुम्हें। घबरा के इधर-उधर देखा मैंने, कमरे में कोई नहीं था। डर के मारे कहानी के अध्-लिखे पन्ने फाड़ कर फ्लश-आउट कर दिए मैंने। शांत रात में सिर्फ़ हवाएं बह रहीं थीं , मैंने गौर से कान लगा कर सुना। वो हवाएं एक दर्द-भरा गीत गा रहीं थीं।
“मोरी पतुरियाँ माई गंगे बहा देव
मैं तो चली परदेस मोरे लाल”

An Open Letter To Mr. Milind Deora

milind deora

Dear Mr. Deora,

Thanks for a great article in TOI of August 14, 2013. It was enlightening to hear the views of one of our elected representatives on a topic that’s close to the hearts of many a youngster in this country. However, some points you raised are worthy of a debate, the benefits of which you’ve extolled in your article, and hence a response was warranted. I will try to summarize your main points so as to keep the response closely tied to the article.

Point #1: Social media platforms do not allow for healthy debate, while our Parliament does.

This point of view is expected and unsurprising within the small minority amongst us who’re on the other side of the “Great Divide of Government of India”, but isn’t substantiated by facts. I call it the Divide because our governance system, from the Parliament at the top right down to the beat constable and peon in a sarkari office, is extremely hard to approach and get service from for a common citizen, which is the very reason for its existence. For the vast majority of the population of this country, it’s almost like a government for itself, by itself, and of itself.

Therefore, we do not hold the Parliament’s ability to hold healthy debates in any high esteem when we read reports that the number of hours that our Lok Sabha sits during its five-year term has been falling steadily, and reached the worst ever record in the 15th Lok Sabha (http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-04-29/india/38902758_1_lok-sabha-budget-session-sittings). Not only that, this Lok Sabha is also on its way to achieving the dubious distinction of having passed the fewest bills in independent India’s history.

So where does the common citizen go to express their anguish about a non-functioning government? Social media. For the first time, there is a platform that allows every individual the opportunity to be heard by millions of other people, and we’re going out there in hordes to talk about the pain we all on this side of the Divide experience every single day. For the average person, Twitter and Facebook are less about popularity and approval ratings like you mentioned, and more about spreading the word about their experiences and finding common cause with others.

Point #2: Changes that result due to outbursts enabled by social media are not well thought-through

You reference the Arab Spring and Iranian Awakening and the Brazilian protest, but miss the protests on the streets of New Delhi during Anna Hazare’s campaign and after the 2012 brutal gangrape incident. But you make a valid point. Protests by people are usually looked upon as a threat by established governments, and the point being made is missed for the noise, and slowly the protest transforms into an us-vs-them battle. However, did our government react any differently during the protests staged in India? Did we ever get closer to getting a Lokpal bill enacted or a corruption-free government? Did we ever get closer to having the streets of this country safe for our sisters and daughters? Unfortunately no. And this lack of solution-building is not attributable to the use of social media, but to the absence of a sensitive, humble, and engaged leadership within our government.

Point #3: Social media encourages pretence, showmanship, and shallow posturing

Assume social media doesn’t exist in our country. Walk out on the streets like a common man and watch how politicians, top bureaucrats, and the rich and powerful of this country move. You will see beacons, blaring sirens, police and personal security pushing everyone else aside, or stopping them altogether. From the posh NDMC areas, try walking towards other parts of Delhi where the top government officials of our country do not live. You will notice that broad, tree-lined, spotlessly clean boulevards give way to congested, filthy, broken roads that have people, vehicles, animals all crammed into every inch of space possible. If this isn’t pretence, showmanship, and posturing, what is? It’s not about the tools we use, but who we are and how we think that creates the vices that you ascribe to social media.

You are a young and well-educated leader of this country, and we are looking to you to bring a change in our country. What we need is very simple – equal access to basic amenities like clean water, air, food, and adequate housing, and equal opportunity to fulfill one’s dreams, for every single citizen of this country. We hope you care enough for your country and its people to work towards this goal, and will not get lost in the distractions that power in our country carries with it in heavy doses.

Regards,

Sarvesh

नशा ही नशा है

change society blog

शीला चित्रवंशि कि कलम से

कहीं यह शीर्षक “नशा ही नशा है “देख कर आप सब चौंक तो नहीं गए? क्योंकि मैं ये सब नशे में नहीं लिख रही हूँ। वरन सही मायने मैं आप सभी का ध्यान इस बदलते हुए समाज के अन्दर जो निरंतर नयी नयी कुरीतियाँ फैलती जा रही हैं, उनकी ओर आकर्षित करना चाह रही हूँ। आज समाज में दिन-ब-दिन जो बदलाव आते जा रहे हैं उससे आप सभी अनभिज्ञ नहीं। यानि की सामाजिक ढांचा ही बदल चुका है। जिसका सीधा-सादा प्रभाव एवं परिवारों पर कहीं कम तो कहीं ज्यादा नज़र आता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

सवाल यह नहीं है कि लोग अनभिज्ञ है या फिर भिज्ञ; सवाल तो यह है की हमारी भारतीय संस्कृति पाश्चात्य सभ्यता से कहाँ तक प्रभावित है और क्यों? समय-समय पर बदलाव तो हमारे समाज में सदियों से चले आ रहे हैं – यह कोई नयी बात भी नहीं है। फिर समाज हो या परिवार, सब उससे प्रभावित भी हुए हैं। पर इतना भी नहीं कि अपनी ही संस्कृति या उसकी सभ्यता तथा अपने ही नैतिक मूल्यों को समाप्ति की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया हो। ध्यान दें तो परिवर्तन न केवल सृष्टि का नियम है वरन समय की माँग भी है। समझने वाली बात यह है की हमारे भारतीय समाज में फैली हुई वे कुरीतियाँ जिनका सीधा-सादा प्रभाव हमारी भारतीय सभ्यता एवं  संस्कृति पर पड़ा , क्या वह पश्चिमी सभ्यता का अन्धानुकरण नहीं?

यहाँ पर हमारा उद्देश्य किसी भी देश की संस्कृति या फिर उसकी सभ्यता पे टीका-टिपण्णी अथवा कटाक्ष या व्यंग्य करना नहीं । हर देश की अपनी अलग अलग संस्कृति एवं सभ्यता होती है जो वहां के वातावरण, पर्यावरण, उनके अपने आचार-विचार एवं वहां की सामाजिक स्थिति पर निर्भर करती है। अब उसके लिए ये आवश्यक नहीं कि हम विदेशी संस्कृति की अपनाकर ही आधुनिक या फिर उच्च व्यक्तित्व वाले कहलायेंगे। हम अपनी संस्कृति में रह कर भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बन सकते हैं । देखा जाये तो हमारे अपने ही देश में विभिन्न प्रकार की संस्कृतियाँ देखने को मिलती हैं। उदहारण स्वरुप मराठी, गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी आदि आदि। पर हर एक संस्कृति की अलग-अलग सभ्यता देखने को मिलती है। उनके खान-पान, रहन-सहन, पहनना-ओढना , नृत्य कला, संगीत एवं भाषाएँ तक अलग अलग हैं । गर्व की बात यह भी है कि विभिन्नता में भी अभिन्नता देखने को मिलती है। सबकी अपनी अलग अलग पहचान है। जहां तक मेरा अनुभव है किसी देश की संस्कृति अच्छी या बुरी नहीं होती। यह पूरी तरह हम पर और हमारे समाज पर निर्भर करता है कि हम क्या अपनायें और क्या ना अपनायें ।

वर्त्तमान सामाजिक बदलाव को देखकर तो ऐसा ही लगने लगा है जैसे न ही अपनी संस्कृति रह गयी है और न ही कोई सभ्यता शेष है। जहाँ तक सवाल उठता है पाश्चात्य सभ्यता का तो हम लोगो ने उनकी संस्कृति की अच्छाइयों को नज़रंदाज़ करके उनकी उस सभ्यता को अपनाया है हमारी भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल है। जिस भारतीय समाज में हम रहते हैं , वहां का वातावरण, सभ्यता एवं मर्यादाएं तथा उनके नैतिक मूल्य कुछ और हैं। ऐसे में जब हम उनके पहनावे में अपने आपको ढालते हैं तो उनकी खुली सोच और उनके खुलेपन का अन्धानुकरण कर बैठते हैं, जो हमारे वातावरण में नग्नता सी दिखती है। आजकल हमारे समाज में मानो आधुनिकता की परिभाषा ही बदल गयी है, जो जितना कम से कम पहन कर अधिक से अधिक शारीरिक प्रदर्शन करे, उसे ही आधुनिक समझते हैं। उसे ही हमारे समाज में “modernity ” का नाम दिया जाता है।

इतना ही नहीं, समाज में फैले हुए विभिन्न प्रकार के नशे का प्रभाव भी कम नहीं है। आज खुलेआम  drugs का सेवन करते हुए अधिकतर स्कूल के लड़के लड़कियां इधर-उधर घूमते नज़र आते हैं । साथ ही युवा वर्ग भी पीछे नहीं हैं। जगह जगह पर pubs देर रात तक dance floor में केवल लड़के लड़कियां ही नहीं अपितु युवक-युवतियां  भी पश्चिमी धुनों पर डांस करते, थिरकते , smoke करते  नजर आते हैं । इधर बड़े शहरों में आजकल एक प्रचलन और चला है “Hukka Bar” का, पर उन हुक्कों में तम्बाकू के स्थान पर drugs हुआ करता है । ऐसे वातावरण में अश्लील व्यंग्यों की भी कोई कमी नहीं होती जिसका परिणाम भी स्पष्ट रूप से झलक रहा है । आये दिन छोटी बच्चियों से बलात्कार, छोटे छोटे स्कूल में पढ़ते नाबालिग बच्चों का ज़रा-ज़रा सी बात पर झगड़ा, गाली- गलौज, धमकाना, डराना, एक दूसरे की जान तक ले लेना – ऐसी बातों से समाचार-पत्र भरे पड़े मिलते हैं ।

आजकल समाज में जो कुछ भी चल रहा है क्या इसकी ज़िम्मेदारी हमारी युवा पीढ़ी के साथ साथ हमारे media पर नहीं जाती? आज सभी वर्गों में अधिकतर लोगों के पास दूरदर्शन एवं कंप्यूटर की सुविधा होती है। इस कारण बच्चे बाहर कम अन्दर दूरदर्शन एवं कंप्यूटर पर अधिकतर बैठे दिखाई देते हैं । ऐसे में जाने-अनजाने, सही-गलत का अनुभव न होने के कारण बच्चे जब दूरदर्शन एवं कंप्यूटर देखते हैं, तो उनके मानस-पटल पर जो छवि बैठ जाती  है वे वही करने की कोशिश करते हैं, और प्रायः कर बैठते हैं, जिसका प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है।

ऐसी स्थिति में हमारी युवा पीढ़ी आज की आने वाली पीढ़ी से थोड़ा-बहुत भी संतुलन बना कर चले तो सामंजस्य मुश्किल नहीं । आज का वातावरण देख कर तो ऐसा लगने लगा है जैसे हमारी भारतीय संस्कृति विदेशी संस्कृति से इतना प्रभावित हो चुका है कि अपने ही नैतिक मूल्यों को खोकर पाश्चात्य सभ्यता की ओढ़नी से अपनी  ही सभ्यता और संस्कारों को ढकते चले जा रहे हैं । सोचना यह है कि युवा-पीढ़ी इस बदलाव के इन झोंकों के साथ बहकर इतनी दूर न चले जाए कि अपनी ही धरोहर को – जो भारतीयता के नाम से जानी जाती है – खो बैठे, और उनके अपने ही पास अपने बच्चों को देने के लिए कुछ शेष न रह जाये।

अभी कुछ वर्ष पूर्व तक हमारे समाज में एक शब्द “मर्यादा” का भी हुआ करता था, पर आजकल के वातावरण में इस शब्द की कोई मर्यादा नहीं रह गयी है । कभी-कभार कहीं कहीं आते जाते कानों में पड़ जाता है की मर्यादा में रहना सीखो । आज वर्तमान पीढ़ी को आप कुछ भी कहें तो आवाज़ एक ही आती है, वो भी चारो तरफ से “पता नहीं आप लोग किस ज़माने की बातें कर रहे हैं। दुनिया इतनी बदल चुकी है की लोग चाँद पर पहुँच गए पर आप लोग रहेंगे वाही लकीर के फ़कीर।” आजकल स्थिति एकदम फर्क हो चुकी है। इस पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि चाँद पर पहुँचाना एक अलग बात है । हम आज अपने संस्कारों को खोये बिना ही वह सब कुछ कर सकते हैं जो हम चाहते हैं । ऐसा लगता है जैसे परिवार और समाज के पारस्परिक संबधों का ह्रास  होता जा रहा है, जिसके कारण सामजिक तनाव बढ़ता जा रहा है । समाज में फैली कुव्यवस्था का एक मुख्य कारण यह भी है ।

मेरा लिखने का आशय ये कदापि नहीं कि मैं आप लोगों को कोई उपदेश या नसीहत दे रही हूँ, वरन समाज में फैली हुई इन कुरीतियों पर ध्यान दिलाना चाहती हूँ जिन पर आपका दृष्टिकोण जाता ही नहीं, क्यूँकि आप स्वयं ही उससे प्रेरित हो चुके हैं । पीढ़ियों का अंतर तो स्वाभाविक है पर अगर हम और आप चाहें तो पीढ़ियों के बीच एक मद्य संतुलन बना कर भावी पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं ।

 

 

Galaxy Star Review: A Phone Worth Its Price

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Considering the price point this could be a game-changer phone in the Indian smartphone segment. An MRP of Rs. 5000 makes this phone the cheapest Android phone from Samsung and unlike others, which run older versions of the OS, this one, runs the latest Jelly Bean Android 4.1. 

Looks like an option doesn’t it? Lets look deep and figure out pros and cons although frankly after taking time out with it we feel that at this price point this is the best you can get.

The Pros: 

Looks: Not bad for the price although nothing extraordinary considering these are the times of big screens. The cute small size though will suit a few who have been complaining of a lack of smartphone, which is small and does not look a giant. Compare it with other local brands and the finish is first class. Samsung has done a good job for the price.

Apps: Android Jelly Bean means good apps and also good games. This is where the phone steals the show. The phone gives decent experience to a user with popular services like Gmail, Google Talk, Facebook, Twitter and WhatsApp. All this at 5k, wow.

Screen And Colors: Its OK. Again at a price point that the phone is positioned at, little can be complained about. It has good touch interface and shows bright colors but the process is fine.

Battery and others: So the battery is decent, around 14 hours on 2g connection. The camera is 2 megapixel and pictures taken are good to be uploaded on your social presence. Bad light images though is not that great and video shoot also could have been better.

The Cons:

No 3g: What? Yes, there is no option for 3g. The phone only operates on 2g and WiFi. This is certainly a let down in this quick communication world where almost everyone is moving from 2g to 3g.

A tad slow: The phone works well for search, Facebook etc. but the moment you demand a little more, the price point and the cheapness there shows up. The phone turns slow and older apps are also flushed out of memory.

Verdict: Good phone on the price point. If you are looking for an affordable android phone with basic usage like mail and social media and have a budget around 5k, this is the device. A little more though from the wallet could get you better phones.

Twitterati And The Madras HC Sentence On Pre-Marital Sex And Marriage

marriage

Madras High Court still trends on Twitter after their sentence yesterday was misread by a section who jump the gun without trying to lift it. Here are some epic ones

Anand (@_Anand_i): Employee: Sir, shadi k liye chhutti chahiye. Boss: Arey, chutti ki kya zaroorat h.Lunch hour mein niptaa lo na.

Kanika Upadhya (‏@NikkiUpadhyay): So how many of you have woken up married this morning? :p

Alabhya Narang ‏(@alabhya_mufc): “marriages are made in heaven” acc to the new law marriages are made in bed

Ramesh Srivats ‏(@rameshsrivats): Karunanidhi: Hahaha. I’ve been married three times. Sunny Leone: Hehe. Poda, amateur.

Shiv Aroor ‏(@ShivAroor)“I’m breaking up with you. All you are interested in is marriage.”
shammy baweja ‏(@shammybaweja)So, is there no such thing as being single anymore
Sorabh Pant ‏(@hankypanty): Next time you touch yourself – you aren’t masturbating, you’re throwing away a million rishtas.
milind soman ‏(@milindrunning): Thank God my wives now have other husbands
Pratik Trivedi ‏(@ptrivedi2186): How many of you got married last night?
And finally
Screw Driver ‏(@iamritjangid): U don’t need a mangalsutra, u just need a room.

Hashtags On Facebook: Implications For You And Your Brand

hashtag

With Facebook finally having forced to follow Twitter and Instagram and having had to onboard hashtags, there has to be implications. Here are 4 most important ones for you and your brand 

1. What’s Trending: What is most important for a marketer on a social media platform. It is to know what’s making the most noise and is being followed frantically. Twitter and Google+ are two platforms which clearly show what’s trending because these are easily captured via Hashtags. With FB now bringing Hash, it would soon make people know what’s trending on FB which is nowhere in sight currently. Imagine with the number of folks on FB how crucial this will be for brands and for common folks.

2. Increase in Exposure: Till now what you posted on facebook was limited to the number of fans you had and constantly added. Now everything that you post on the platform with a relevant and appropriate hashtag is visible to everyone who is looking for something close to that. Imagine you are a photographer and with each photo with a relevant hashtag you will be connected to folks who would be looking for services in the domain you cater to. With the kind of numbers and engagement that Facebook see’s you are in with a business once you work with good relevance.

3. Customizing your Hashtags: So you thought this will increase spam, not really. Facebook will allow you to filter and search for hashtagged comments within your social circle as well. So if you want to know what your network is saying about a get-together that you have planned, you can just filter it down to your network, thus avoiding spam that is unwanted information. Extrapolate this and imagine the same for a brand, how relevant isn’t it?

4. Massive Advertising Reach: The reach of advertising will increase massively through hashes. Imagine Tata Nano launching a new car with some feature that is worth talking. They push the ad on Facebook with a #Nanonew. Now anyone who comments on the video and uses the hash becomes a part of the thread irrespective of him/her commenting on the video post. The best part is Tata can take stock of everything that has been happening on it. Works great, isn’t it?

We all know Hash tags have been very successful for both Twitter and Instagram. It enables users from all over the globe to come over and discuss on things they want to, breaks global divide completely. By bringing Hash on Facebook, it has increased competition, especially for Twitter which had launched its advertising space very recently. How will it impact both the platform we will know in a while, for now though the brands stand to gain a lot from all the efforts.