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सरहद पार-कैदी की पुकार

POW's

अभिनव सिंह की एक छोटी सी कोशिश… सरहद पार कैदियों की स्थिति का चित्रण… इस कविता के माध्यम से 

भारत के सरहद पार,

सलाखों के पीछे से कैदी की पुकार। 
हे! भाग्य विधाता,
क्युं नहीं मेरे भाग्य जगाता। 

रोज रात को सोता जब मैं,
रो देता हूँ अक्सर तब मैं।
आंखों से गिरते आँसू की धार,
याद दिलाती है माँ के आँचल का प्यार।

नव प्रभात आता है जब-जब,
आतें है मन में विचार तब-तब। 
क्या कोई ऐसी सुबह नहीं हो सकती,
कि मुझे आजादी दिला सकती। 

या कोई पवन का झोंका संदेश लिए,
आता किसी शाम।
दिल में होती बेइन्तहा खुशी,
होंठों पर होता पैगाम।

सोच-सोच मन कुंठित होता,
नींद बिना रातों को सोता। 
देशों को सरहद ने बांटा,
दिल को क्युं नफरत ने काटा।

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किसान-एक संवेदनशील जीवन

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Abhinav Singh writes on why the farmer, who completes our lives, struggles to keep up his own.

ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।
बंज़र भूमि, बंज़र जीवन,
ज़िन्दगी भी तबाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।
कैसे हो बच्चों की शिक्षा पुरी,
कैसे पुरी हो परिवार की अभिलाषा अधुरी।
खुद मुक्त भी नहीं होती यह जीवन,
मुक्त हो जाए तो होती हमारी चाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।
 
कोई नेता कहीं अपनी मुर्ति बनवाए,
कोई खेलों से करोड़ों कमाए।
अश्क भी कोई समझ ले,
क्युं नहीं किसी को हमारी परवाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।

बीते पल

Energetic teenager
Abhinav Singh goes back and reflects on the old days that were so Golden. Some memories as we say always remain.
अचानक क्यूँ ऐसा मन को हुआ,
क्यूँ ना पुरानी यादों को टटोला जाये|
दोस्तों की पुरानी फोटो और,
स्कूल की पुरानी पुस्तकों को खोला जाये|
 
यह सब कर,
एक अपनापन सा जगने लगा|
ऐसा पहले भी हुआ है,
न जाने क्यूँ लगने लगा|
सच कहते हैं,
जब कुछ बीत जाये तो,
एक कमी सी लगती है|
तब उसकी कद्र नहीं की,
यह सोच,
आँखों में नमी सी लगती है|
वक़्त हर पल आगे ही क्यूँ जाता है,
सुनहरे बीते पलों को,
फिर से क्यूँ नहीं दिखाता है|
काश वक्त अंगड़ाई लेना सिख ले,
ये सोच,
जिंदगी हसीं सी लगती है|
सच कहते हैं,
जब कुछ बीत जाये तो,
एक कमी सी लगती है|
तब उसकी कद्र नहीं की,
यह सोच,
आँखों में नमी सी लगती है|

ओस जैसी ज़िन्दगी…

dew drops

Abhinav SIngh continues to use words to melt us. Another masterpiece.

हरे झुकते पत्तों पे सरसराती सी फिसलन,
घास पे हीरे के जैसे हो रखी,
जैसे कोई नयी नवेली दुल्हन।
अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश,
क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस।
तेरा अस्तित्व तेरा वजूद तब दिखता,
जब बूंदों से होती ये ज़मीन पावन।
बिन बारिश न  है तू, जब  होती,
तो पल  में सिमटता तेरा जीवन।
अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश,
क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस।
जिंदगी चाहे छोटी हो,
पर हंसी हरपल  बनी रहे।
कुछ ओस से ही सिख ले,
कि चमक हरपल सजी रहे।
अंततः तुझे जाना है,
रिसते हुए मिटटी के आगोश।
फिर भी जिन्दगी जीना,
तू सिखला जाती ओस।

माँ…

mother poem cover

Abhinav Singh continues the Mothers Week special with this heart touching poem.

एक शब्द ही नहीं,
ममता का रूप हो तुम|
हर कदम मिलने वाली,
छाँव और धुप हो तुम|
भर दे जो जीवन को,
जिस प्रेम एवं आशिर्वाद से,
वो एहसास हो तुम|
क्युं लगे मेरी माँ ,
की कहीं आसपास हो तुम|

मुश्किलों में तुम हो सहारा,
एक अपना है हमारा|
जिसने ये जीवन सवारा,
वो एहसास हो तुम|
क्युं लगे मेरी माँ,
की कहीं आसपास हो तुम|

हमारी नींद जिनकी,
जागती आँखों में सोती|
जो हमारे कष्टों में,
पलपल रोती|
जन्म ही नहीं,
जीवन भी दिया तुमने|
इसलिए ख़ास हो तुम|
क्युं लगे मेरी माँ,
की कहीं आसपास हो तुम|

प्रियतम की वो बाट देखती, अब तक जाने क्यूँ बैठी है?

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प्रियतम की वो बाट देखती, अब तक जाने क्यूँ बैठी है?
श्याम सुंदरी ये रात की बगी‍या,
दिन भर सोई,
ऊंघी – अलसी सी,
दिन के ढलते खिल जाती है |
बाट जोहती, राह देखती,
आतूर प्रियतम से मिलने को,
दिल की इक छोटी फरियाद,
बेचैन है साथी को कहने को |
उज्ज्वल शीतल रात की तह में,
अपने जीवन की सच्चाई को ओढ़े,
जब हवा भी ढंड से सिकुड़ी जाती,
वो दग्ध हो रही खुद की ज्वाला में |
हवा से पूछे, रात से पूछे,
अपनी हर इक बात से पूछे –
“द्वार खुला है माली सोया
जब चाहे जो चाहे आये” |
रात बीतती पल पल हर पल…
पूरब से सूरज की परछाई
नभ पर धीरे धीरे बढती,
पक्षी के कलरव की गूँज
माली ले रहा अंगड़ाई |
प्रियतम की वो बाट देखती,
अब तक जाने क्यूँ बैठी है?
क्यूँ नहीं जाती बगिया से बाहर,
अपने प्रेमी प्रियतम से मिलने,
सोच रहा हूं जा कर पुछूं,
क्या कोई परेशानी है?
जाती क्यूँ नहीं उसे-से मिलने,
जिसकी वो दीवानी है |
सोता हुआ वो बूढ़ा माली
लाठी टेकता, लंगड़ाता सा,
अबूझ पहेली, आँखों में प्रश्न लिए
धीरे-धीरे बढ़ता है |
प्यार-भरा वो स्नेहील चुम्बन
वक्त कर रहे, एक पिता का प्यार,
शायद यह वही प्यार था,
जिसने उसको रात में रोका,
अपने साथी से मिलने को.
“ द्वार खुला था आज़ादी थी,
फिर भी वो चुपचाप थी बैठी |”
                                    – by Atul Singh

सब खवाब हुए धूमिल…..

depressed-person

पैदा हुवा मै जिस दिन, माँ-बाप मुस्कुराये I

थी तंग घर की हालत, लड्डू ना बाँट पाये I I

बस आस उम्मीदों में, बचपन भी मेरा बीता I

हर हसरत रही अधूरी, लगता रहा पलीता I I

ना शिक्षा मिली ढंग की, ना काम ढंग का पाया I

संघर्षों ने जर्जर, कर डाली मेरी काया I I

शादी भी मैंने कर ली, पैदा किये दो बच्चे I

हालात अपने फिर भी, हो पाए नहीं अच्छे I I

महीने से हफ्ता पहले, घर में ना टिकता राशन I

तब खाने को मिलता है बीवी का केवल भाषण I I

पीता हूँ ख़ूनी आंसू , है ह्रदय मेरा ज़ख्मी I

जीवन में सदा मुझसे, रूठी रही है, लक्ष्मी I I

सब खवाब हुए धूमिल, अरमान सारे टूटे I

है आखिरी तमन्ना, ये प्राण तन से छूटे I I

हे ईश!  मेरे मुझको, बस इतना डर सताता I

जिस राह से मै गुजरा, बच्चों का ना हो नाता I I

depresshun