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Confessions of a Commitment Shirker

By Ankit Chandra

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This is my dedication to all those ppl who can never get to committing to sumone and then later crib about it 😀 enjoy!!

I think I have never done the romantic thing
A dozen roses and a diamond ring
many times I have been peeled and pricked
but I really couldn’t feel a thing…

So is that a hormonal imbalance or a psychological one?
that I just cannot settle with anyone?

from ‘Boys 2 Men’ to ‘Alanis Morisette’
Their lyrics never really conveyed any sense
Although there were those who ‘waited and waited’ for me to ask them out,
but got no returns for their perseverance..

heh.. so what on earth is wrong with me?
for she ain’t good enuf, whoever she be?
well on second thoughts that isn’t quite true.
coz I usually repent when the moment passes through

I guess I vindicate what my teacher once said,
‘Oh my child u have an empty head’…. 😛

And this is what our fellow commitment shirkers added:

“There was once a time when it was commitment i was afraid of
But now it seems it was actually me the pretty ladies were scared of”

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घुलता हुआ एहसास

Sad-Love-Poem

Ankit Chandra writes this forlorn lover poem with a caveat. Don’t label him as a forlorn lover, this is just an artistic creation. Wonderfully crafted though, enjoy

सोचता तो था की शायद उसको याद करता हूँ
पर अहसास अब कुछ कम होता है

कुछ समय पहले चाहता तो उसे बहुत था
पर महसूस अब थोडा कम करता हूँ

कहीं से कुछ कम हुआ है या खुद ही ख़त्म हो रहा हूँ
पर कुछ बातों को याद करके मायूस अब थोडा कम होता हूँ

सूरज को देखने की आदत तो नहीं पड़ी है,
पर चाँद को अब कभी कभी ही देखता हूँ

किसी और का नाम तो नहीं आया है अभी जुबां पे,
पर उसका नाम ज़रूर कम लेता हूँ

देर रात तक जागना तो अभी शुरू नहीं किया है,
पर रात में अभी भी कम सोता हूँ

आँखें अभी तक सूखी तो नहीं है
पर शायद अब थोडा कम रोता हूँ..

किसान-एक संवेदनशील जीवन

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Abhinav Singh writes on why the farmer, who completes our lives, struggles to keep up his own.

ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।
बंज़र भूमि, बंज़र जीवन,
ज़िन्दगी भी तबाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।
कैसे हो बच्चों की शिक्षा पुरी,
कैसे पुरी हो परिवार की अभिलाषा अधुरी।
खुद मुक्त भी नहीं होती यह जीवन,
मुक्त हो जाए तो होती हमारी चाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।
 
कोई नेता कहीं अपनी मुर्ति बनवाए,
कोई खेलों से करोड़ों कमाए।
अश्क भी कोई समझ ले,
क्युं नहीं किसी को हमारी परवाह है।
ये कैसा जीवन,
जुबां पे सिर्फ आह है।
क्या करें पता नहीं,
क्युं नहीं मिलती कोई राह है।

ओस जैसी ज़िन्दगी…

dew drops

Abhinav SIngh continues to use words to melt us. Another masterpiece.

हरे झुकते पत्तों पे सरसराती सी फिसलन,
घास पे हीरे के जैसे हो रखी,
जैसे कोई नयी नवेली दुल्हन।
अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश,
क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस।
तेरा अस्तित्व तेरा वजूद तब दिखता,
जब बूंदों से होती ये ज़मीन पावन।
बिन बारिश न  है तू, जब  होती,
तो पल  में सिमटता तेरा जीवन।
अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश,
क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस।
जिंदगी चाहे छोटी हो,
पर हंसी हरपल  बनी रहे।
कुछ ओस से ही सिख ले,
कि चमक हरपल सजी रहे।
अंततः तुझे जाना है,
रिसते हुए मिटटी के आगोश।
फिर भी जिन्दगी जीना,
तू सिखला जाती ओस।

इस चिंगारी को एक बार सुलग जाने दो . .

rebel

By Atul Singh

जो बंद रही,
इतने दिनों तक,
अंधकार की कोठरियों मे ।
उस तिल तिल जलती ज्योति को,
इस बार उजियारी फैला जाने दो ॥
.
जो रूह,
उनकी हैवानीयत सह,
आज तक कराहती रही ।
उस रूह को तन से जुदा कर के,
हैवानो से भिड़ जाने दो ॥
.
वो चिंगारी,
जो नस नस में,
गर्म लहू बन बहती रही,
उस गर्म लहू को आज हिया से
लावा बनके फूट जाने दो ॥
.
जो जीवन,
अब तक शून्य रहा,
सांसो की अवलम तारों से ।
उन उखड़ी सांसो की तारों को,
अंतर्मन से जुड़ जाने दो ॥
.
कर उद्विग्न,
ले दीपक को कर मे,
जग मे उजीयारी फैला जाने दो ।
खत्म करे जो तम का अंधेरा,
उस चिंगारी को ,
एक बार, सुलग जाने दो ॥

जलता जीवन, जलते तुम हम

Burning Woods burning life
By Atul Singh
जलता ज़ीवन जलते तुम हम,
ख़त्म हो गई राहें सब ।
आगे है घनघोर अँधेरा
दुःख की बदली छाई है ।
साथ मिलाकर छोड़ गए सब,
क्यूँ तू संग मेरे आई है ॥
क्यूँ करू तुझसे प्रणय निवेदन,
क्या तू जीवन सार मिला ।
किया तिरस्कार तूने है अब तक,
क्यूँ अब तेरा प्यार जगा ॥
तू ठहरी अलका का वैभव,
पर अवनी का मैं भी पुजारी हूँ ।
प्रेम सिखा कर चली गई जो,
उसका मैं आभारी हूँ ॥
प्रेम है क्या ये तू क्या जाने ,
मीरा की वो मूरत होती ।
जिससे मैंने किया प्रेम था,
प्रेम की सूरत वैसी होती ॥.
क्यूँ डाले बाहों के घेरे ,
करती मुझको आलिंगन ।
मैं तो हूँ एक ठहरा पानी,
क्यूँ तू खोजे उसमे जीवन ॥
उसमे ज़ीवन नही मिलेगा,
फूल प्रेम का नही खिलेगा ।
जलता जीवन मेरा अब तक,
जो प्रेम करेगा वो भी जलेगा ॥
” जो प्रेम करेगा वो भी जलेगा “