Tag Archives: Hara (Hinduism)

तेरा रिश्ता बड़ा कमाल पिता

fathers-day-canada

Satish Tehlan is back with a bang and this time with a wonderful poem continuing our Father’s Day week long celebrations. Awesome read as always. 

ऊँगली पकड़ कर तू ही संभाले,
सिखाता पहली चाल पिता।

कभी घोड़ा बन-कभी कंधे ले,
तूने सहलाए मेरे बाल पिता।

तेरी प्यार भरी इक चुम्बन से,
है खिल जाते मेरे गाल पिता।

मुझे मम्मी अच्छी लगती,
पर देता है सब माल पिता।

तेरी मेहनत, तेरे पसीने से,
मेरे घर की ईंटे लाल पिता।

हर संकट स्वयं झेलता,
है गोवेर्धन सी ढाल पिता।

केवल तेरे ही दम से है,
मेरा घर रहता खुशहाल पिता।

मेरे घर आँगन की बगिया के,
तुम ही हो तरुवर-छाल पिता।

मेरी हिम्मत-शौहरत तुमसे है,
तेरे बिन जीवन बेहाल पिता।

मै कायल हूँ तेरे जज्बे का,
तेरा रिश्ता बड़ा कमाल पिता।

Working Dad walking with son

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प्रियतम की वो बाट देखती, अब तक जाने क्यूँ बैठी है?

girl waiting for someone
प्रियतम की वो बाट देखती, अब तक जाने क्यूँ बैठी है?
श्याम सुंदरी ये रात की बगी‍या,
दिन भर सोई,
ऊंघी – अलसी सी,
दिन के ढलते खिल जाती है |
बाट जोहती, राह देखती,
आतूर प्रियतम से मिलने को,
दिल की इक छोटी फरियाद,
बेचैन है साथी को कहने को |
उज्ज्वल शीतल रात की तह में,
अपने जीवन की सच्चाई को ओढ़े,
जब हवा भी ढंड से सिकुड़ी जाती,
वो दग्ध हो रही खुद की ज्वाला में |
हवा से पूछे, रात से पूछे,
अपनी हर इक बात से पूछे –
“द्वार खुला है माली सोया
जब चाहे जो चाहे आये” |
रात बीतती पल पल हर पल…
पूरब से सूरज की परछाई
नभ पर धीरे धीरे बढती,
पक्षी के कलरव की गूँज
माली ले रहा अंगड़ाई |
प्रियतम की वो बाट देखती,
अब तक जाने क्यूँ बैठी है?
क्यूँ नहीं जाती बगिया से बाहर,
अपने प्रेमी प्रियतम से मिलने,
सोच रहा हूं जा कर पुछूं,
क्या कोई परेशानी है?
जाती क्यूँ नहीं उसे-से मिलने,
जिसकी वो दीवानी है |
सोता हुआ वो बूढ़ा माली
लाठी टेकता, लंगड़ाता सा,
अबूझ पहेली, आँखों में प्रश्न लिए
धीरे-धीरे बढ़ता है |
प्यार-भरा वो स्नेहील चुम्बन
वक्त कर रहे, एक पिता का प्यार,
शायद यह वही प्यार था,
जिसने उसको रात में रोका,
अपने साथी से मिलने को.
“ द्वार खुला था आज़ादी थी,
फिर भी वो चुपचाप थी बैठी |”
                                    – by Atul Singh

सब खवाब हुए धूमिल…..

depressed-person

पैदा हुवा मै जिस दिन, माँ-बाप मुस्कुराये I

थी तंग घर की हालत, लड्डू ना बाँट पाये I I

बस आस उम्मीदों में, बचपन भी मेरा बीता I

हर हसरत रही अधूरी, लगता रहा पलीता I I

ना शिक्षा मिली ढंग की, ना काम ढंग का पाया I

संघर्षों ने जर्जर, कर डाली मेरी काया I I

शादी भी मैंने कर ली, पैदा किये दो बच्चे I

हालात अपने फिर भी, हो पाए नहीं अच्छे I I

महीने से हफ्ता पहले, घर में ना टिकता राशन I

तब खाने को मिलता है बीवी का केवल भाषण I I

पीता हूँ ख़ूनी आंसू , है ह्रदय मेरा ज़ख्मी I

जीवन में सदा मुझसे, रूठी रही है, लक्ष्मी I I

सब खवाब हुए धूमिल, अरमान सारे टूटे I

है आखिरी तमन्ना, ये प्राण तन से छूटे I I

हे ईश!  मेरे मुझको, बस इतना डर सताता I

जिस राह से मै गुजरा, बच्चों का ना हो नाता I I

depresshun