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Fashion & Flirting (With Men Of Course)

By Tahira

Alpha-Male

I have always been a gourmet. Good food turns me on and wait! Let me be more precise – it has to be a non-vegetarian delicacy – either chicken or sea food. However, at times I do prefer indulging in other activities that makes life much more happening for a young woman – like fashion, shopping for the latest Prada handbag or a Giovanni Dress or a pair of stilettos from Jimmy Choo — what more to make life exciting? Hmm… well you guessed it right… MEN!!!

So three things… food, fashion and flirt (with Men obviously!) that can make a life much better! What say?

Sitting idle on a Saturday, I was flipping through a women’s magazine. Though am not much the kinds who would spend hours over the latest issue of Vogue or discussing the latest pair of lingerie launched – but such occasional deviations were definitely welcoming. My eyes suddenly fell on a perfume ad. It goes without saying that it featured a male model with the perfect six pack abs on which possibly every woman would dream of.

The uber-cool model posing shirtless (or should I say topless) staring seductively at the camera made me drool for a fraction of a second. How I wish my boyfriend would at least smell like (if not look like) the fragrance; exuding masculinity and passion at its best from every nook and corner. I must confess, the charm of the ad was too irresistible to ignore!

So, all you ladies out there, how would you like your boyfriends to be?

Who’s your kind of man???

Come up with all your ideas, opinions, fantasies

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Ae Zindagi Mujhe Teri Hi Hain Talaash

By Chandan Das

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Ae Zindagi ye kaisa hain tera khel , Kaisi hain teri maaya

Kisi ko di apni barqat ki dhoop , to kisi ko soonepan ki chhaya !

Koi saasein le raha hain maut aane ke baad bhi, to koi hain zinda laash,

Ae Zindagi mujhe teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash !!

Ae Zindagi ye kaisa hain tera khel ,Kaisi hain teri maaya

Jaise ki CIRCUS ka JOKER, apne aansu dabaakar duniya ke liye muskaraaya !

Wo dekho singhasan par RAJA baitha hain udaas, udhar Rank bola “hota main RAJA kaash”

Ae Zindagi mujhe teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash !!

Ae Zindagi ye kaisa hain tera khel , Kaisi hain teri maaya

Kisi ko bakshi jannat tune, to kisi pe apna sitam yu tune dhaaya !

Bekasoor ko mili bewajah wo sazaa, aur Gunehgaar ka na hua Pardafaash,

Ae Zindagi mujhe teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash !!

Ae Zindagi ye kaisa hain tera khel , Kaisi hain teri maaya

Kuchh na le paya yaha se wo , kyuki bhoola ki khaali haath hi tha wo yaha aaya !

SITA ka haran kiya jis ghamand se, usi ghamand ne kiya RAAVAN ka sarvanaash,

Ae Zindagi mujhe teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash !!

Ae Zindagi ye kaisa hain tera khel , Kaisi hain teri maaya

Udhar husn hain jiska khubsurat , utna hi daravana uska saaya !

Pulkit hain yaha koi sab kuchh khokar bhi , to koi sab kuchh paakar bhi hain hataash,

Ae Zindagi mujhe teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash, teri hi hain Talaash !!

Confessions of a Commitment Shirker

By Ankit Chandra

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This is my dedication to all those ppl who can never get to committing to sumone and then later crib about it 😀 enjoy!!

I think I have never done the romantic thing
A dozen roses and a diamond ring
many times I have been peeled and pricked
but I really couldn’t feel a thing…

So is that a hormonal imbalance or a psychological one?
that I just cannot settle with anyone?

from ‘Boys 2 Men’ to ‘Alanis Morisette’
Their lyrics never really conveyed any sense
Although there were those who ‘waited and waited’ for me to ask them out,
but got no returns for their perseverance..

heh.. so what on earth is wrong with me?
for she ain’t good enuf, whoever she be?
well on second thoughts that isn’t quite true.
coz I usually repent when the moment passes through

I guess I vindicate what my teacher once said,
‘Oh my child u have an empty head’…. 😛

And this is what our fellow commitment shirkers added:

“There was once a time when it was commitment i was afraid of
But now it seems it was actually me the pretty ladies were scared of”

घुलता हुआ एहसास

Sad-Love-Poem

Ankit Chandra writes this forlorn lover poem with a caveat. Don’t label him as a forlorn lover, this is just an artistic creation. Wonderfully crafted though, enjoy

सोचता तो था की शायद उसको याद करता हूँ
पर अहसास अब कुछ कम होता है

कुछ समय पहले चाहता तो उसे बहुत था
पर महसूस अब थोडा कम करता हूँ

कहीं से कुछ कम हुआ है या खुद ही ख़त्म हो रहा हूँ
पर कुछ बातों को याद करके मायूस अब थोडा कम होता हूँ

सूरज को देखने की आदत तो नहीं पड़ी है,
पर चाँद को अब कभी कभी ही देखता हूँ

किसी और का नाम तो नहीं आया है अभी जुबां पे,
पर उसका नाम ज़रूर कम लेता हूँ

देर रात तक जागना तो अभी शुरू नहीं किया है,
पर रात में अभी भी कम सोता हूँ

आँखें अभी तक सूखी तो नहीं है
पर शायद अब थोडा कम रोता हूँ..

नशा ही नशा है

change society blog

शीला चित्रवंशि कि कलम से

कहीं यह शीर्षक “नशा ही नशा है “देख कर आप सब चौंक तो नहीं गए? क्योंकि मैं ये सब नशे में नहीं लिख रही हूँ। वरन सही मायने मैं आप सभी का ध्यान इस बदलते हुए समाज के अन्दर जो निरंतर नयी नयी कुरीतियाँ फैलती जा रही हैं, उनकी ओर आकर्षित करना चाह रही हूँ। आज समाज में दिन-ब-दिन जो बदलाव आते जा रहे हैं उससे आप सभी अनभिज्ञ नहीं। यानि की सामाजिक ढांचा ही बदल चुका है। जिसका सीधा-सादा प्रभाव एवं परिवारों पर कहीं कम तो कहीं ज्यादा नज़र आता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

सवाल यह नहीं है कि लोग अनभिज्ञ है या फिर भिज्ञ; सवाल तो यह है की हमारी भारतीय संस्कृति पाश्चात्य सभ्यता से कहाँ तक प्रभावित है और क्यों? समय-समय पर बदलाव तो हमारे समाज में सदियों से चले आ रहे हैं – यह कोई नयी बात भी नहीं है। फिर समाज हो या परिवार, सब उससे प्रभावित भी हुए हैं। पर इतना भी नहीं कि अपनी ही संस्कृति या उसकी सभ्यता तथा अपने ही नैतिक मूल्यों को समाप्ति की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया हो। ध्यान दें तो परिवर्तन न केवल सृष्टि का नियम है वरन समय की माँग भी है। समझने वाली बात यह है की हमारे भारतीय समाज में फैली हुई वे कुरीतियाँ जिनका सीधा-सादा प्रभाव हमारी भारतीय सभ्यता एवं  संस्कृति पर पड़ा , क्या वह पश्चिमी सभ्यता का अन्धानुकरण नहीं?

यहाँ पर हमारा उद्देश्य किसी भी देश की संस्कृति या फिर उसकी सभ्यता पे टीका-टिपण्णी अथवा कटाक्ष या व्यंग्य करना नहीं । हर देश की अपनी अलग अलग संस्कृति एवं सभ्यता होती है जो वहां के वातावरण, पर्यावरण, उनके अपने आचार-विचार एवं वहां की सामाजिक स्थिति पर निर्भर करती है। अब उसके लिए ये आवश्यक नहीं कि हम विदेशी संस्कृति की अपनाकर ही आधुनिक या फिर उच्च व्यक्तित्व वाले कहलायेंगे। हम अपनी संस्कृति में रह कर भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बन सकते हैं । देखा जाये तो हमारे अपने ही देश में विभिन्न प्रकार की संस्कृतियाँ देखने को मिलती हैं। उदहारण स्वरुप मराठी, गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी आदि आदि। पर हर एक संस्कृति की अलग-अलग सभ्यता देखने को मिलती है। उनके खान-पान, रहन-सहन, पहनना-ओढना , नृत्य कला, संगीत एवं भाषाएँ तक अलग अलग हैं । गर्व की बात यह भी है कि विभिन्नता में भी अभिन्नता देखने को मिलती है। सबकी अपनी अलग अलग पहचान है। जहां तक मेरा अनुभव है किसी देश की संस्कृति अच्छी या बुरी नहीं होती। यह पूरी तरह हम पर और हमारे समाज पर निर्भर करता है कि हम क्या अपनायें और क्या ना अपनायें ।

वर्त्तमान सामाजिक बदलाव को देखकर तो ऐसा ही लगने लगा है जैसे न ही अपनी संस्कृति रह गयी है और न ही कोई सभ्यता शेष है। जहाँ तक सवाल उठता है पाश्चात्य सभ्यता का तो हम लोगो ने उनकी संस्कृति की अच्छाइयों को नज़रंदाज़ करके उनकी उस सभ्यता को अपनाया है हमारी भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल है। जिस भारतीय समाज में हम रहते हैं , वहां का वातावरण, सभ्यता एवं मर्यादाएं तथा उनके नैतिक मूल्य कुछ और हैं। ऐसे में जब हम उनके पहनावे में अपने आपको ढालते हैं तो उनकी खुली सोच और उनके खुलेपन का अन्धानुकरण कर बैठते हैं, जो हमारे वातावरण में नग्नता सी दिखती है। आजकल हमारे समाज में मानो आधुनिकता की परिभाषा ही बदल गयी है, जो जितना कम से कम पहन कर अधिक से अधिक शारीरिक प्रदर्शन करे, उसे ही आधुनिक समझते हैं। उसे ही हमारे समाज में “modernity ” का नाम दिया जाता है।

इतना ही नहीं, समाज में फैले हुए विभिन्न प्रकार के नशे का प्रभाव भी कम नहीं है। आज खुलेआम  drugs का सेवन करते हुए अधिकतर स्कूल के लड़के लड़कियां इधर-उधर घूमते नज़र आते हैं । साथ ही युवा वर्ग भी पीछे नहीं हैं। जगह जगह पर pubs देर रात तक dance floor में केवल लड़के लड़कियां ही नहीं अपितु युवक-युवतियां  भी पश्चिमी धुनों पर डांस करते, थिरकते , smoke करते  नजर आते हैं । इधर बड़े शहरों में आजकल एक प्रचलन और चला है “Hukka Bar” का, पर उन हुक्कों में तम्बाकू के स्थान पर drugs हुआ करता है । ऐसे वातावरण में अश्लील व्यंग्यों की भी कोई कमी नहीं होती जिसका परिणाम भी स्पष्ट रूप से झलक रहा है । आये दिन छोटी बच्चियों से बलात्कार, छोटे छोटे स्कूल में पढ़ते नाबालिग बच्चों का ज़रा-ज़रा सी बात पर झगड़ा, गाली- गलौज, धमकाना, डराना, एक दूसरे की जान तक ले लेना – ऐसी बातों से समाचार-पत्र भरे पड़े मिलते हैं ।

आजकल समाज में जो कुछ भी चल रहा है क्या इसकी ज़िम्मेदारी हमारी युवा पीढ़ी के साथ साथ हमारे media पर नहीं जाती? आज सभी वर्गों में अधिकतर लोगों के पास दूरदर्शन एवं कंप्यूटर की सुविधा होती है। इस कारण बच्चे बाहर कम अन्दर दूरदर्शन एवं कंप्यूटर पर अधिकतर बैठे दिखाई देते हैं । ऐसे में जाने-अनजाने, सही-गलत का अनुभव न होने के कारण बच्चे जब दूरदर्शन एवं कंप्यूटर देखते हैं, तो उनके मानस-पटल पर जो छवि बैठ जाती  है वे वही करने की कोशिश करते हैं, और प्रायः कर बैठते हैं, जिसका प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है।

ऐसी स्थिति में हमारी युवा पीढ़ी आज की आने वाली पीढ़ी से थोड़ा-बहुत भी संतुलन बना कर चले तो सामंजस्य मुश्किल नहीं । आज का वातावरण देख कर तो ऐसा लगने लगा है जैसे हमारी भारतीय संस्कृति विदेशी संस्कृति से इतना प्रभावित हो चुका है कि अपने ही नैतिक मूल्यों को खोकर पाश्चात्य सभ्यता की ओढ़नी से अपनी  ही सभ्यता और संस्कारों को ढकते चले जा रहे हैं । सोचना यह है कि युवा-पीढ़ी इस बदलाव के इन झोंकों के साथ बहकर इतनी दूर न चले जाए कि अपनी ही धरोहर को – जो भारतीयता के नाम से जानी जाती है – खो बैठे, और उनके अपने ही पास अपने बच्चों को देने के लिए कुछ शेष न रह जाये।

अभी कुछ वर्ष पूर्व तक हमारे समाज में एक शब्द “मर्यादा” का भी हुआ करता था, पर आजकल के वातावरण में इस शब्द की कोई मर्यादा नहीं रह गयी है । कभी-कभार कहीं कहीं आते जाते कानों में पड़ जाता है की मर्यादा में रहना सीखो । आज वर्तमान पीढ़ी को आप कुछ भी कहें तो आवाज़ एक ही आती है, वो भी चारो तरफ से “पता नहीं आप लोग किस ज़माने की बातें कर रहे हैं। दुनिया इतनी बदल चुकी है की लोग चाँद पर पहुँच गए पर आप लोग रहेंगे वाही लकीर के फ़कीर।” आजकल स्थिति एकदम फर्क हो चुकी है। इस पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि चाँद पर पहुँचाना एक अलग बात है । हम आज अपने संस्कारों को खोये बिना ही वह सब कुछ कर सकते हैं जो हम चाहते हैं । ऐसा लगता है जैसे परिवार और समाज के पारस्परिक संबधों का ह्रास  होता जा रहा है, जिसके कारण सामजिक तनाव बढ़ता जा रहा है । समाज में फैली कुव्यवस्था का एक मुख्य कारण यह भी है ।

मेरा लिखने का आशय ये कदापि नहीं कि मैं आप लोगों को कोई उपदेश या नसीहत दे रही हूँ, वरन समाज में फैली हुई इन कुरीतियों पर ध्यान दिलाना चाहती हूँ जिन पर आपका दृष्टिकोण जाता ही नहीं, क्यूँकि आप स्वयं ही उससे प्रेरित हो चुके हैं । पीढ़ियों का अंतर तो स्वाभाविक है पर अगर हम और आप चाहें तो पीढ़ियों के बीच एक मद्य संतुलन बना कर भावी पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं ।

 

 

The Stupid Girl!

stupid girl

By Ganesh Subramanian

She thinks she is beautiful

But in reality she is pitiful

She thinks she is everyman’s dream

But seeing her face in midnight makes a child scream

She thinks she is intelligent

But her brain can’t be activated even by a chemical reagent

She thinks she is worldly-wise

But her superficial knowledge is like melting ice

She thinks she is a super star

But she is nothing more than a black stone of tar

She thinks her boyfriend is a Rambo

But who will tell her that she herself is a Dumbo

She thinks she is the cynosure of all eyes

But she is nothing more than a walking dead body hunted by flies

She thinks she wears the best dress in the town

But seeing her colour choice makes even the apathetic frown

She thinks she is a heavenly wonder

But her friends know that she is only a God’s blunder

When trying to think, her lips curl

But thoughts don’t come to her, after all she is a stupid girl !

Losing Me

A poem by Debashree Sinha

losing me

To begin with I would want to make exit from myself
But as the mirror smiles at me I wonder “Can I ever get rid of this!”
The bad tempered maid, the the quarelling auto driver
The loud mouthed colleague—
I have distanced myself from all.
Even he was not spared from the spite
But soon my own shadow started to haunt me
But how to distance ‘me’ from myself?
Silence, stormy silence…
Knock,knock,knock
Tirra Lirra, Tirra Lirra
Ghosts , Knights , Goblins have caught my tongue
I feel the coming of chaos on my shoulders

But like Prometheus I am bound …
Not to an icicle , to myself
and now for long the keys to my freedom have been lost.