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ओस जैसी ज़िन्दगी…

dew drops

Abhinav SIngh continues to use words to melt us. Another masterpiece.

हरे झुकते पत्तों पे सरसराती सी फिसलन,
घास पे हीरे के जैसे हो रखी,
जैसे कोई नयी नवेली दुल्हन।
अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश,
क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस।
तेरा अस्तित्व तेरा वजूद तब दिखता,
जब बूंदों से होती ये ज़मीन पावन।
बिन बारिश न  है तू, जब  होती,
तो पल  में सिमटता तेरा जीवन।
अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश,
क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस।
जिंदगी चाहे छोटी हो,
पर हंसी हरपल  बनी रहे।
कुछ ओस से ही सिख ले,
कि चमक हरपल सजी रहे।
अंततः तुझे जाना है,
रिसते हुए मिटटी के आगोश।
फिर भी जिन्दगी जीना,
तू सिखला जाती ओस।
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मेरी माँ

MotherAndSonAbstracted

Continuing our Mother’s Week celebrations, here is another masterpiece by a fabulously talented upcoming poet Syed Bilal. Maa Tujhe Salaam. 

कितनी रातें तू जागी है
कितने दिन रात रोई है ,
तकलीफों को अपनी माँ
मुस्कराहट में संजोयी है ,

कितने जत्नों के बाद जन्मा
तुमने मुझको ऐ अम्मा
मेरी हर आह पे ऐ माँ
तू रो आँचल भिगोई है ,

नमाज़ों में दुआओं में
तूने जन्नत न है मांगी
के मांगी है मेरी बस खैर
मेरी खुशी-आबादी मांगी है ,

ममता  तेरी ओ मेरी माँ
मुझको हौसला दे जाती है
के जाऊं मैं कहीं भी
तेरी बस याद  आती है ,

कितनी  माएँ आज रोती हैं
रास्तों पे वो रहती हैं
के अपनों ने न माना है
घर से उनको निकाला है ,

दुखों में दर्द में रहती हैं
कई तकलीफें सहती हैं
फिर भी बच्चों को अपने
बद-दुआ वो न देती है ,

सुधर जाओ संभल जाओ
माँ का मतलब समझ जाओ
के जन्नत है मुहब्बत है
माँ ही बस ऐसी अज़मत है ,

मेरा वादा है तुझसे माँ
दिल न तेरा दुखाऊंगा
तेरी ख़ुशी -हसी के लिए
मैं तो कुछ भी कर जाऊंगा
के रखूँगा सदा पलकों पे
फ़र्ज़ सारे निभाऊंगा

आपका 
बिलाल