लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 3


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– अनघ शर्मा

अपने बचपन में किसी भूगोल की किताब में पढ़ा था कि दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट इंडोनेशिया में हुआ था। इतना बड़ा की उसमें से निकले धुएं के कारण अगले पूरे वर्ष धरती के एक बहुत बड़े हिस्से का तापमान सामान्य से कई गुना नीचे दर्ज़ किया गया था। मैं जब तक उसके पास रहा ये जान ही नहीं पाया की कितना कुछ धधकता है उसके भीतर। अब सोचता हूँ कि अगर उसके भीतर का ज्वालामुखी फट गया होता तो कितने वर्षों के लिए हिम-युग आता। पर न ज्वालामुखी फटा, न ऐसा कुछ हुआ। आख़िरी बार भी बहन ही ने खबर दी थी उसके बारे में।
बड़ी बदल गयी है वो, अजब बुढ़ापा झांकता है उसके चेहरे से अब।
बूढी तो अपनी माँ भी लगने लगी हैं, याद है कितनी खूबसूरत थीं हमारे बचपन में , मैंने कहा।
ब्यूटी इज़ द कर्स। वो बोलीं।
फ़ोन रखने के बाद मैं देर तक उसी की याद में डूबा रहा, पर सिवाय एक धुंधले के कुछ नहीं दीखा। वैसे भी जब से बंगलौर शिफ्ट हुआ हूँ ,घर जाना ही नहीं हो पाया। पिछले दस सालों में तो एक बार भी नहीं जा पाया हूँ। रात की शांत फ़िज़ा बार-बार खुद में यही दोहरा रही थी कि हर इमारत को एक रोज़ खंडर में बदलना ही होता है।
” जानते नहीं ख़ूबसूरती की ज़िल्द पर सबसे पहले जंग लगती है। फिर टुकड़ा-टुकड़ा, पर्त-पर्त ये ज़िल्द खुद ही गल जाती है ……… वर्तमान की जो भी इमारत अपने अतीत में जितनी ज्यादा खूबसूरत रही होगी भविष्य में उसके खंडर बन्ने की आशंका उतनी ही प्रबल होगी। वैसे भी खूबसूरत चेहरों को बदलने में वक़्त ही कहा लगता है? बस एक वक्फ़ा …….

कहाँ तक पहुंचे छोटे लल्ला ?
अजब है तू भी, चित्त- पट्ट का मामला थोड़े है। सिक्का उछालूं, थामूं, देखूं और फ़ैसला हो गया।
तुम तो बहुत बखत बरत रहे हो।
तो क्या किस्सा-कोताही कर दूं ?
तुम से अच्छा तो छोटी जिजी कह-लिख देतीं।
तो फिर उसी के पास जा। हट! परे।
वो उदासी में डूबा हंसता चेहरा ले कर चली गयी। पर जाते-जाते एक भेद पकड़ा गयी कि सबसे पहले हंसते चेहरों की हंसी उतर कर देखनी चाहिए। आजकल उदासी बड़ी चालक हो गयी है। अगर खुश रहना है तो छुपी उदासी को निकाल फेंकना होगा। हाँ पता है उदासी और डर बड़े पक्के होते हैं ,एक बार पकड़ लें तो फिर छोड़ते नहीं। शांत बहते पानी में ज्यों अचानक पहाड़ियां निकल आयें, ऐसे मन पर कब्ज़ा कर लेते हैं ये। कई बार तो यह भय जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं। फिर भी जीवन जीना ही है आखिर तक। जीवन की चाह को लगातार ईधन देना पड़ता है, हर हाल में। जीवन की राहें आसन नहीं होतीं, किसी के लिए भी नहीं।
उसके जीवन की राह भी बड़ी कठिन थी,उसके नियंत्रण से परे। वो अगढ़-अनपढ़ भले ही थी पर बड़ी समझदार थी। वो जानती थी कि राह अगर टेढ़ी-मेढ़ी, पथरीली हो तो भी एक बार को कट ही जाएगी। पर वह सपाट राह जो काई से चिकनी हुई, शैवालों से पटी पड़ी हो, उसका क्या ?और अगर ऐसी फिसलन भरी डगर पर मूंह बके बल गिरना निश्चित हो तो क्या नंगे पांव खड़े हो संतुलन बनाये रखने की चेष्टा करना या चप्पल पहन तुरंत ही गिर पड़ना।

थोड़ी देर यूँ ही बेतरतीब ख्यालों में उलझे रहने के बाद मैंने बहुत दिन घर से बाहर रहने के कारण फ़ोन में जमा हुए वॉइस-मेसेज सुनना शुरू कर दिए। उनमें से एक बड़ी बहन का भी था तो कुछ वक़्त बाद उन्हें ही फ़ोन मिला दिया।
कैसी हो ?
ठीक हूँ। तू कैसा है ?
मैं भी ठीक हूँ।
तेरी आवाज़ थकी हुई सी कैसी लग रही है ?
बस ज़रा-बहुत थकावट है।
बड़ी रात गए फ़ोन किया तूने? सब खैरियत ?
हाँ, आज ही लौटा हूँ हैदराबाद से, तुम्हारा वॉइस-मेसेज था फ़ोन में तो सोचा तुम से ही बात कर लूं।
और क्या चल रहा है ?
कुछ नहीं, अच्छा तुमसे एक बात पूछनी थी।
क्या?
मुझे आजकल धीमरी बहुत दीखती है सपनों में। तुम जानती हो उसके नीम-पागल होने की क्या वजह थी।

सोशल-इंजस्टिस,सामाजिक अन्याय और हम सब में छुपा हुआ सबसे बड़ा भय। तब ज़माना आज के जैसे नहीं था कि एक कैंडल-मार्च निकालो लोग साथ जुड़ जायेंगे, भले ही धीरे-धीरे ही सही। दबंगों की दबंगई से तो आज भी मिडिल-क्लास और छोटा तबका डरता है, तब की तो बात ही छोडो। छोटे शहरों में तथाकथित बदलाव की गुंजाईश ही कहाँ होती थी तब ?
छोटे शहर चुस्त-ट्राउज़र्स की तरह होते हैं। धड से नीचे घुटनों तक इतने चुस्त की हवा भी इकहल्लर नहीं निकल सकती। घुटनों से नीचे जिस हिस्से को थोड़ी आज़ादी होती है वो हिस्सा मध्य-वर्ग का है ,जो चार पैसे जोड़ मौका लगते ही अपने बच्चों को बड़े शहरों की तरफ निकल देते हैं ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह पाए,पर सबसे ज्यादा मार खाता है हमारे यहाँ का निचला तबका। ढंकने को उसके पास कुछ होता नहीं नंगा वो चाह कर भी नहीं हो सकता। बंद पड़े-पड़े ख्यालों में बेड-सोर पैदा हो जाते हैं, कुंठाएं पनप जाती हैं, ज़हन कुंद पड़ जाते हैं।
लूट-डकैती दबंग डालते हैं और पुलिस पकड़ के ले जाती है गरीब घरों के बच्चों को। जिन्हें ये सिस्टम धीरे-धीरे पेशेवर मुजरिम में ढाल देता है। कुछ सालों में ये बच्चे हाव-भाव, चाल-ढाल,शक्ल-सूरत, रंग-रूप में एक जैसे हो जाते हैं। हाँ ये सच है अब समय बदला है और समाज के बड़े प्रोटेगोनिस्ट इन्हीं तबकों से निकलते हैं।
अरे !छोड़ो ये बातें , उसकी बताओ।

ऐन होली से एक रात पहले दबंगों के लड़के खींच कर ले गए थे इसको। रात भर बिना कपड़ों के नचाया इसे। कपड़ों के बदले सौदा तय हुआ मीना का। बाद में खाली पेटीकोट थमा के भेज दिया इसे।
और कोई बोल नहीं मुहल्ले भर से?
सब सोते रहते हैं ऐसे मौकों पर।
और मीना ?
मीना कब लौटी, किस हाल में लौटी ? किसी ने नहीं देखा। जब अम्मा ही महीनों बाद जान पाई तो कोई और क्या जानता?
मुझे क्यों नहीं बताया? मैं लगभग रुआंसा सा बोल।
तुम बंगलौर थे उस वक़्त कॉलेज में। हमें खुद ही बहुत देर से पता चला तो तुम्हें क्या बताते।बाद में सालों बीतने पर लगा की अब बताने का क्या औचित्य ? बाद में अम्मा ही राजघाट जा कर उसका सब सामान बहा आईं थीं। पर कुछ और भेद भी छुपा था उनके मन में जिसे कोई और नहीं जान पाया कभी भी, लोग अक्सर सच छुपा ही जाते हैं। एक बात पता है तुझे, लाल, नीली, पीली, चमकीली, काली, दुनिया में मौजूद और भी जितनी स्याहियां हैं उन सब का इस्तेमाल करके किस्से-कहानियां लिखने वाले जानते हैं कि वो पूरा सच नहीं लिख रहे हैं। चाहे कल्पना का ही नाम क्यों न दें उसे पर अधूरी ही है हर बात। भले ही कागज़ पर लिखी जाये, या रेशम पर, या फिर पत्थर पर ही उकेरी जाये , हर कहानी सच पर एक कलई चढ़ाये रखती है। चाहे मैं लिखूं या कोई और पर पूरा या पूरे जैसा कोई कभी कुछ लिख ही नहीं पाता। सच हमेशा कहानियों में नए-नए कपड़े पहने टुकड़े-टुकड़े में ही आ पाता है। पूरा सच तो अनगढ़, उलझा, लश्तम-पश्तम ताले लगे मन में कहीं पड़ा हुआ सांस लेता रहता है। मजाल है किसी की जो अपने ही मन का ताला खोल सच टटोल सके।

फ़ोन काटने के बाद मैं सन्न, अवाक बैठा रह गया। क्या था ये जो मुझे अभी पता चला ? कोई डरावना सच, या किसी फिक्शन का हिस्सा जो पढ़ा नहीं बस सुना भर हो। किस दर्ज़ा ट्रॉमा होगा। कैसी भयानक सौदेबाज़ी होगी वो? जिस्म के बदले जिस्म उफ़ !। मैं पक्षघात के मरीज सा थम के रह गया। कोई चिकोटी काटे तो भी महसूस न हो।

देखा छोटे लल्ला मैं कहती थी न छोटी जिजी तुम से अच्छा लिख लेती हैं। कैसी सुघराई से सब बता गईं तुम्हें। घबरा के इधर-उधर देखा मैंने, कमरे में कोई नहीं था। डर के मारे कहानी के अध्-लिखे पन्ने फाड़ कर फ्लश-आउट कर दिए मैंने। शांत रात में सिर्फ़ हवाएं बह रहीं थीं , मैंने गौर से कान लगा कर सुना। वो हवाएं एक दर्द-भरा गीत गा रहीं थीं।
“मोरी पतुरियाँ माई गंगे बहा देव
मैं तो चली परदेस मोरे लाल”

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