लिखते हुए कुछ ख़्वाब से – 1


love pictures

– अनघ शर्मा

” जब मोरे राजा पिया गये हैं बगीचा
भौंरा भनर-भनर होये मेरी गुइंयाँ ”
लक-दक करके दामन से झाड़ो तो अनगिनत यादें झड जाती हैं। पर ये भी तो सच ही है कि इतनी आसानी से कभी कोई याद भी नहीं आता। दिली तौर पर याद करना और ज़हनी तौर पर याद करना दोनों अलग-अलग हैं, फिर भी कुछ यादें ज़हन और दिल के बीच कहीं अटकी रहती हैं। उसकी याद भी कुछ ऐसी ही थी, कहीं ज़हन और दिल के बीच सुस्त पड़ी। पर एक कोशिश तो करनी ही थी इसे निकालने की। सो ये तय हुआ कि यादों के तोशखाने में से एक रजाई निकाली जाये। फिर रात भर कोई याद ओढ़ो। पुरानी याद की धुंधली गंध रिसते-रिसते दिल के तहख़ाने में बैठ जायेगी। यूँ एक कहानी के जन्म की बात होगी …… शर्त ये कि पैदाइश तक रजाई तोशखाने में वापस न रखी जाए।

उसकी तो पूरी कहानी ही शर्तों पे टिकी हुई थी।
पहली शर्त ये की …
“उसे उसके असली नाम से बुलाया जाये न कि लोक-प्रचलित धीमरी से ”
दूसरी ये की …….
“वो कहाँ से है ये कोई न जान पाए ”
दूसरी शर्त तो जायज़ है। पर पहली,भला ये भी कोई बात हुई,असली नाम से पुकारें। उसके माँ-बाप या हमारी माँ को छोड़ इक्का-दुक्का ही कोई होगा जो उसका असली नाम जनता होगा। सभी तो उसे धीमरी कह कर बुलाते थे, अब इस नाम में क्या बुराई है भला ?
बुराई है,यह बड़ा व्यक्ति -वाचक है।एक बार लो तो तमाम दुनिया जान जाये। सो असली नाम छद्म पहचान का काम करेगा। न लिखने वाले के मन पे ही कोई बोझ और न उसके ही मन पर।
कई बार बड़ी बहन से कहा तुम ही लिख मारो उसकी कहानी। किस्से-कहानियों में तुम्हारा हाथ सधा हुआ है। पूरा न्याय कर पाओगी उस के साथ, जैसे अनुभवी शल्य चिकित्सक के हाथों त्वचा को सिलने में टांका इंच भर भी इधर-उधर नहीं होता, ठीक वैसे ही।
सो हर बार की तरह वही एक जवाब। अरे ! उस पर कहानी लिखना कोई डबल रोटी का टुकड़ा खाने जैसा है क्या ? कि जैम नहीं तो न सही मार्मलेड लगा कर खा लेंगे। ये तो याद है, ठीक नमक की तरह, अगर स्वाद लेना हो तो खुद ही चखना पड़ता है। बाकी मौका-बेमौका, वक़्त-बेवक्त तुम्हें ठोंक-पीट कर दुरुस्त करते रहेंगे। फिर तुम्हारी यारी-दोस्ती भी थी उसके साथ सो तुम्ही लिखो।
अजी क्या ख़ाक दोस्ती थी ? असल नाम तक तो याद नहीं हमें उसका। करो, अब करो दुरुस्त ??
अच्छा याद कर जब वो कोई काम बिगाड़ देती थी तो क्या कहती थीं अम्मा ?
“एक काम भी ठीक से नहीं होता तुझसे, वही हाल है तेरा आँख के अंधे नाम नयनसुख। आँखें है या बुझते दिये, देख के भी नहीं चलती। ”
ये अलग बात है कि नज़र उसकी पाक-साफ़ 6/6 थी।
तो पहली शर्त के लिहाज़ से उसका नाम नैनतारा था।
उसकी जो सबसे स्पष्ट याद है,वही बड़ी धुंधली है। चेहरा-मोहरा, कद-काठी तो अब याद नहीं ढंग से, मगर कुछ याद है तो उसके कॉलर-बोन के गड्ढे। वो इतने बड़े और इतने गहरे थे कि मुझे हमेशा लगता था जैसे दो सूखे हुए तालाब हों, और कभी इनमें बेतवा का साफ़-ठंडा पानी भरा रहता होगा। बेतवा इस लिए की दूसरी शर्त के लिहाज़ से वो ऐसे इलाके से भाग कर आई थी,जो कहीं बेतवा किनारे था।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s