मेरी माँ


MotherAndSonAbstracted

Continuing our Mother’s Week celebrations, here is another masterpiece by a fabulously talented upcoming poet Syed Bilal. Maa Tujhe Salaam. 

कितनी रातें तू जागी है
कितने दिन रात रोई है ,
तकलीफों को अपनी माँ
मुस्कराहट में संजोयी है ,

कितने जत्नों के बाद जन्मा
तुमने मुझको ऐ अम्मा
मेरी हर आह पे ऐ माँ
तू रो आँचल भिगोई है ,

नमाज़ों में दुआओं में
तूने जन्नत न है मांगी
के मांगी है मेरी बस खैर
मेरी खुशी-आबादी मांगी है ,

ममता  तेरी ओ मेरी माँ
मुझको हौसला दे जाती है
के जाऊं मैं कहीं भी
तेरी बस याद  आती है ,

कितनी  माएँ आज रोती हैं
रास्तों पे वो रहती हैं
के अपनों ने न माना है
घर से उनको निकाला है ,

दुखों में दर्द में रहती हैं
कई तकलीफें सहती हैं
फिर भी बच्चों को अपने
बद-दुआ वो न देती है ,

सुधर जाओ संभल जाओ
माँ का मतलब समझ जाओ
के जन्नत है मुहब्बत है
माँ ही बस ऐसी अज़मत है ,

मेरा वादा है तुझसे माँ
दिल न तेरा दुखाऊंगा
तेरी ख़ुशी -हसी के लिए
मैं तो कुछ भी कर जाऊंगा
के रखूँगा सदा पलकों पे
फ़र्ज़ सारे निभाऊंगा

आपका 
बिलाल 

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2 thoughts on “मेरी माँ

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