जलता जीवन, जलते तुम हम


Burning Woods burning life
By Atul Singh
जलता ज़ीवन जलते तुम हम,
ख़त्म हो गई राहें सब ।
आगे है घनघोर अँधेरा
दुःख की बदली छाई है ।
साथ मिलाकर छोड़ गए सब,
क्यूँ तू संग मेरे आई है ॥
क्यूँ करू तुझसे प्रणय निवेदन,
क्या तू जीवन सार मिला ।
किया तिरस्कार तूने है अब तक,
क्यूँ अब तेरा प्यार जगा ॥
तू ठहरी अलका का वैभव,
पर अवनी का मैं भी पुजारी हूँ ।
प्रेम सिखा कर चली गई जो,
उसका मैं आभारी हूँ ॥
प्रेम है क्या ये तू क्या जाने ,
मीरा की वो मूरत होती ।
जिससे मैंने किया प्रेम था,
प्रेम की सूरत वैसी होती ॥.
क्यूँ डाले बाहों के घेरे ,
करती मुझको आलिंगन ।
मैं तो हूँ एक ठहरा पानी,
क्यूँ तू खोजे उसमे जीवन ॥
उसमे ज़ीवन नही मिलेगा,
फूल प्रेम का नही खिलेगा ।
जलता जीवन मेरा अब तक,
जो प्रेम करेगा वो भी जलेगा ॥
” जो प्रेम करेगा वो भी जलेगा “
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